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Monday, May 26, 2025

B 20 GAZLEN SALIM RAZA REWA

ख़यालों का परिंदा 🦅 

SALIM RAZA REWA 


21

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गुल-ब-दामाँ तेरी हर सुब्ह रहे शाम रहे 

हर तरफ़ सहने-गुलिस्ताँ में तेरा नाम रहे


सारी दुनिया में तेरे ‘इल्म की ख़ुशबू फैले 

जब तलक चाँद-सितारे  हों तेरा नाम रहे

 

इस तरह तेरे तसव्वुर में मगन हो जाऊँ

मुझ को अपनों से न ग़ैरों से कोई काम रहे

 

जब तेरी दीद को मैं शहर में तेरे पहुचूँ 

मेरे दामन से न लिपटा कोई इल्ज़ाम रहे

 

तेरी ख़ुशहाली की करता हूँ दु’आएँ हर पल

तेरे  दामन में  ख़ुशी सुब्ह रहे शाम रहे

 

हर क़दम मेरा उठे तेरी 'रज़ा' की ख़ातिर 

मेरे  होंटो  पे  हमेशा  तेरा  पैगाम  रहे


——— 2122 1122 1122 22———-

अब भी है रग-रग में क़ाएम प्यार की ख़ुशबू ‘रज़ा’

क्या हुआ जो  ज़िस्म के कपड़े पुराने हो  गए

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गुल-ब-दामाँ- दामन में फूल, सहन-ए-गुलिस्ताँ-गुलशन के आँगन में, तसव्वुर-ख़्याल। दीद-दीदार,देखने, 

नहीफ़- कमज़ोर,



22
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अपनी ज़ुल्फों को धो रही है शब

और ख़ुशबू निचो रही है शब

 

मेरे ख़्वाबों की ओढ़ कर चादर

मेरे बिस्तर पे सो रही है शब


मेरे लफ़्ज़ों को चूमने के लिए 

कैसी पागल सी हो रही है शब 


अब अँधेरों से जंग की ख़ातिर

कुछ चराग़ों को बो रही है शब

 

सुब्ह-ए-नौ के क़रीब आते ही

अपना अस्तित्व खो रही है शब

 

दिन के सदमों को सह रहा है दिन

रात का बोझ ढो रही है शब


.… 2122 1212 22….

तेरे दम से है मुहब्बत का वजूद

तू नहीं तो ज़िंदगी बे-नूर है 

………………

शब-रात।जंग की ख़ातिर- लड़ाई के लिए। चराग़-दीपक।

सुब्ह-ए-नौ,,नए दिन का प्रारंभ। अस्तित्व-स्वरूप।सदमा-यातना।

23

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ख़िज़ाएँ इस लिए सहमी हुई हैं

बहारें लौट कर आने लगी हैं 


लबों पर आ गए शबनम के क़तरे 

ये कलियाँ इसलिए ख़ुश हो रही हैं


सफ़र से लौट कर आई है ख़ुशबू 

फ़ज़ाएँ गुल के नग़में गा रही हैं


अमीरे-शहर के क़ब्ज़े हैं लेकिन

 ग़रीबों की ही कुटियाँ टूटती हैं 


समुंदर को कहाँ ख़ुश्की का डर है

वो नदियाँ हैं जो अक्सर सूखती हैं


भले ख़ामोश हैं ये लब तुम्हारे

मगर आँखे बहुत कुछ कह रही हैं 


'रज़ा' ये रब का है अहसान मुझ पर

जो ख़ुशियाँ मेरे घर में खेलती हैं


.…………… 1222/1222/122……


अमीर-ए-शहर - शहर के धनवान लोग। ख़ुश्की-सूखने।


24

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तमन्ना है सँवर जाने से पहले

तुझे देखूँ निखर जाने से पहले

 

कभी मुझ पर भी हो चश्मे-इनायत 

मेरी हस्ती बिखर जाने से पहले 


गुज़रना है मुझे उन की गली से

वज़ू कर लूँ उधर जाने से पहले


तेरे पहलू में ही निकले मेरा दम

यही ख़्वाहिश है मर जाने से पहले

 

चलो एक प्यार का पौधा लगाएँ

बहारों के गुज़र जाने से पहले

 

‘रज़ा’ इक दूसरे में डूब जाओ 

उजालों के उभर जाने से पहले


..……………

फिर मैं सजदा करते-करते आऊँगा 

अपने दर पर मुझ को वो बुलबाएँ तो

…..……………………………

नज़र-ए-इनायत-दया और स्नेह की दृष्टि। हस्ती-हौसला। पहलू-निकट या पास। ख़्वाहिश- इच्छा


25

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ख़राबी के नज़ारे उग रहे हैं

मुनाफ़े में ख़सारे उग रहे हैं

 

लबों पर खिल रही हैं तेरे कलियाँ

मेरी आँखों में तारे उग रहे हैं 

 

फ़लक चूमे है धरती के लबों को

कि धरती से किनारे उग रहे हैं

 

तुम्हारे ‘इश्क़ में जलने की ख़ातिर

बदन में कुछ शरारे उग रहे हैं

 

फ़लक के चाँद को छूने की ज़िद में

'रज़ा' अब पर हमारे उग रहे हैं


…..……… 12221222122…………

ख़ूब धोया बदन को मल-मल कर

तेरी ख़ुशबू मगर नहीं जाती

………………. 

ख़राबी के नज़ारे- खराब होने की अवस्था या भाव। ख़सारा- नुक़सान। फलक़-आसमान। शरारे-चिंगारियाँ

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26

ख़ूब जी भर सता लिया जाए

और रोने नहीं दिया जाए


सिसकियाँ हो रही हैं कुछ मद्धम

ज़ख़्म को दर्द दे दिया जाए


ग़म को ख़ुशियों का पैरहन दे कर

ग़म को अपना बना लिया जाए


मशवरा है उदास लम्हों को

मौत का हुक्म दे दिया जाए


ख़र्च करके ख़ुशी के कुछ लम्हे

ग़म को पागल बना दिया जाए


मुँह उठाती हैं ख़्वाहिशें इन को

एक तमाचा लगा दिया जाए 


‘इश्क़े-जानाँ की जब ख़ुमारी है

फिर ‘रज़ा’ जाम क्यों पिया जाए


——— 2122/1212/22———-


मद्धम-धीमा, ख़ुमारी-नशा, मस्ती,  ख़्वाहिशें-इच्छाएँ पैरहन-कपड़ा,

21/01/24 - 15/04/25

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27

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तु ग़म भेज दे या ख़ुशी भेज दे 

मेरे हक़ में जो है वही भेज दे


मु’अत्तर बना दे फ़ज़ाओं को जो

हवाओं में वो  ताज़गी  भेज दे


                      मिटा दे जो नफ़रत कि हर तीरगी

चराग़ों में वो रौशनी भेज दे


नहीं कोई बख़्शिश क सामाँ ख़ुदा

मेरे घर कोई मुत्तक़ी भेज दे


सुना कर जिसे ख़त्म हो नफ़रतें

मुहब्बत की वो बाँसुरी भेज दे 


जो ख़्वाबों में आती है अक्सर मेरे

हक़ीक़त में भी वो परी भेज दे 


फ़ज़ाओं में महके मेरा भी सुख़न

ख़यालों में वो शा’इरी भेज दे

……………… 12212212212……………

मुअत्तर-ख़ुशबूदार। फ़जाओं-वातावरण। बख़्शिश का सामाँ-मरने के बाद मुक्ति का तरीक़ा। मुत्तक़ी-इबादत करने, अल्लाह से डरने वाला।


28

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उन का ख़्वाबों में आना-जाना है 

जिन के क़दमों तले ज़माना है 


उम्र भर रूठना मनाना है 

बस यही जीने का बहाना है 


सच नहीं होती  ख़्वाब  की बातें

ख़्वाब  मेरा  मगर  सुहाना है


सिर्फ़ ग़म ही नहीं है दामन में

चंद ख़ुशियों का भी ख़ज़ाना है


दिल ये कहता है तुम चले आओ

आज मौसम  बड़ा  सुहाना  है


मेरी आदत है मुस्कुराने की 

उस की फ़ितरत में दिल दुखाना है 


कैसी ज़िद है ‘रज़ा’ तुम्हारी ये 

दिल लगाना है चोट खाना है 

————2122-1212/22——————

ख़्वाहिश- इच्छा। फ़क़त-सिर्फ़


29

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ख़ुशबू  घुली नहीं है पवन में अभी तलक

क्या मौसमे-ख़िज़ाँ है चमन में अभी तलक

 

मेरे सुनहरे ख़्वाब जलाए हैं उसने यूँ 

करते हैं शोले रक़्स कफ़न में अभी तलक

 

इस रौशनी ने मुझ को चबाया है इस क़दर

दाँतों के हैं निशान बदन में अभी तलक


 इस सम्त बन सँवर के वो आए थे एक बार

हलचल सी हो रही है चमन में अभी तलक


क़िस्मत ने हम को कर दिया बेशक जुदा मगर

उस के हैं ख़्वाब मेरे नयन में अभी तलक


हर धर्म के गुलों से महकता है ये चमन

ख़ुशबू बसी है मेरे वतन में अभी तलक

 

अब तो ज़ुबाँ में पहले सी ताक़त नहीं ‘रज़ा’ 

लज़्ज़त मगर वही है सुख़न में अभी तलक


——-221/2121/1221/212——


मौसम-ए-ख़िज़ाँ-पतझड़ का मौसम, शोले रक़्स-आग का इस सम्त-इस तरफ़, लपटों का नृत्य, सुख़न-लेखन शायरी


30

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तुझे मैं क्या कहूँ, तू क्या मिरा है

तू मेरी ज़िंदगी का आईना है


तड़पता रहता हूँ हर पल तेरे बिन

ये जादू है, मुहब्बत है, ये क्या है


बड़ी मा’सूम है तेरी अदाएँ

मगर घायल हज़ारों को किया है


बहुत ख़ामोश हैं ये लब तुम्हारे

मगर आँखों ने क्या जादू किया है 


जो बरसों क़ैद था आँखों में मेरी 

वो आँखों से मुसलसल बह रहा है


उसे कल ख़्वाब में छेड़ा था लेकिन

मिरी जाने-ग़ज़ल अब तक ख़फ़ा है


‘रज़ा’ किस से कहूँ अपनी हक़ीक़त

मिरे दिल पर किसी का दबदबा है

15/01/24

—————1222/1222/122———-


31

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प्यार का जाम पिला दे मुझ को

और बीमार बना दे मुझ को


तेरा हँसता हुआ प्यारा चेहरा

तेरी आदत न लगा दे मुझ को


अपनी उल्फ़त से बचा ले, या फिर

अपनी नफ़रत से मिटा दे मुझ को


कोई इल्ज़ाम लगा कर मुझ पर

अपने हाथों से सज़ा दे मुझ को


तेरा हर फ़ैसला सर आँखों पर 

ज़हर दे,या कि दवा दे मुझ को


दूर दुनिया से ‘रज़ा’ हो जाऊँ

ख़्वाब इतने न दिखा दे मुझ को


…..…………… ए शे………………

मुझ कॊ मेरे ख़यालों के पर काटने पड़े

उस की उड़ान थी मेरी औक़ात से सिवा

..………………………

ख़ुश-नुमा-नेत्रप्रिय, प्रियदर्शन, सुंदर। दिलकश-आकर्षक।



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जिसे हम प्यार करते हैं उसे रुसवा नहीं करते

हमारे दरमियाँ क्या है कभी चर्चा नहीं करते

 

तुम्हारे प्यार की ख़ुशबू हमेशा साथ रहती  है

तुम्हारी याद के लश्कर मुझे तन्हा नहीं करते

 

उजाले बाँटते फिरते हैं जो बाज़ारे-दुनिया में

किसी सूरत में वो ईमान का सौदा नहीं करते


जहाँ पर ख़ौफ़ के बादल हमेशा मुस्कुराते हैं

परिंदे ऐसी शाख़ों पर कभी बैठा नहीं करते 


‘रज़ा' सीने में जिन के नूरे-ईमाँ जगमगाता है

किसी इंसान पर ज़ुल्मो-सितम ढाया नहीं करते


1222/1222/1222/1222

…..……………ए शेर………………

ज़रा सी देर में लहजा बदल गया उस का 

ज़रा सी देर में औक़ात पे उतर आया  

……………………………………

याद के लश्कर-बहुत सारी यादें। उजाले बाँटना- अच्छा काम करना। नूर-ए-ईमाँ -ईमान की रौशनी।



33

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आख़िर ये ‘इश्क़ क्या है जादू है या नशा है

जिस को भी हो गया है पागल बना दिया है


हाथों में तेरे हमदम जादू नहीं तो क्या है

मिट्टी को तू ने छू कर सोना बना दिया है


उस दिन से जाने कितनी नज़रें लगी हैं मुझ पर

जिस दिन से तूने मुझ को अपना बना लिया है


मैंने तो कर दिया है ख़ुद को तेरे हवाले 

अब तू ही जाने दिलबर क्या तेरा फ़ैसला है


इस दिल का क्या करूँ अब सुनता नहीं है मेरी

तुझ को ही चाहता है तुझ को ही सोचता है


पल भर में रूठ जाना पल भर में मान जाना

तेरी इसी अदा ने दिल को लुभा लिया है


खिलता हुआ ये चेहरा यूँ ही रहे सलामत

तू ख़ुश रहे हमेशा मेरी यही दु’आ है

_______ 22121222212122_______


34

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चौदवीं शब को सरे-बाम वो जब आता है

माहे-कामिल भी उसे देख के शरमाता है


उस की आँखों में कोई जादू नज़र आता है

देखने वाला हर इक शख़्स ठहर जाता है


रक़्स करती हैं बहारें भी उस के आने पर

हुस्न मौसम का ज़रा और निखर जाता है


कितने अल्फ़ाज़ मचलते हैं सँवरने के लिए 

जब ख़्यालों में कोई शे’र उभर आता है


मैं मनाऊँ तो भला कैसे मनाऊँ उस को

मेरा महबूब तो बच्चों सा मचल जाता है


वो जो इक बार निगाहों से इशारा कर दे

दिल किसी और तरफ़ देख नहीं पाता है


जब उठा लेती है माँ हाथ दु’आओं के लिए

रास्ते से ‘रज़ा’ तूफ़ान भी टल जाता है

…..…… 2122  1122  1122  22……

सर-ए-बाम-छत के ऊपर। माह-ए-कामिल -चौदहवीं का पूरा चाँद । तसव्वुर-ख़्यालों। रक़्स- नाचना। अल्फाज़-शब्द समूह, बोल।

35

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गुलशने-दिल में महकने के बहाने आजा

बन के ख़ुशबू मिरी साँसों में  समाने आजा


 मेरे महबूब कभी मिलने-मिलाने आजा

मेरी सोई हुई तक़दीर जगाने आजा


नाम ले-ले के तेरा लोग हँसेंगे मुझ पर

मेरी चाहत की सनम लाज बचाने आजा

 

जिस्म बे-जान हुआ जाता है धीरे-धीरे

रूह बन कर मिरी धड़कन में समाने आजा


 मुझ से मिलने के लिए मौत खड़ी है दर पर 

अपने वा’दे को सनम अब तो निभाने आजा

 

तेरी हर एक अदा जान से प्यारी है मुझे

तू हँसाने न सही मुझ को रुलाने  आजा

 

‘इश्क़ की राह में तन्हा न ‘रज़ा’ हो जाए 

बन के जुगनू तु इसे राह दिखाने आजा

……………2122/1122/1122/22…………


36

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खुल्लम-खुल्ला मुझ से मिलने आएँ तो

मेरे जैसी वो हिम्मत  दिखलाएँ  तो


 

आँखों को कुछ सुस्ताने की मुहलत दो

रस्ता तकते-तकते  गर थक जाएँ तो

 

मन की प्यास रफ़ू-चक्कर हो जाएगी

आँखों के पनघट पे मिलने आएँ तो

 

फिर मैं सजदा करते करते आऊँगा

अपने दर पर मुझ को वो बुलबाएँ तो

 

चाहत पर शबनम की बूँदें मल देना

प्यार की साँसें जिस दम मुरझा जाएँ तो

 

ख़्वाबों में आग़ाज़ मिलन का कर देंगे

अपने मिलन पर पहरे लोग बिठाएँ तो

 

शाम से ही बैठे हैं जाम 'रज़ा' लेकर

यादें उन की आकर हमें सताएँ तो


22/22/22/22/22/2-

शबनम-ओस। आग़ाज़- शुरुआत


37

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मेरे महबूब बता  तुझ को भुलाऊँ कैसे

तू मेरी जान है मैं जान गवाऊँ कैसे

 

तू कहे तो मैं खुरच डालूँ बदन को, लेकिन

अपनी साँसों से तेरी ख़ुशबू मिटाऊँ कैसे

 

तु मुझे याद न कर भूल जा, तेरी मर्ज़ी

अपने दिल से मैं तेरी यादें भुलाऊँ कैसे

 

तुझ से फ़ुरसत ही नहीं मिलती मेरी जान मुझे

तो ख़यालों में किसी और को लाऊँ कैसे

 

तेरी तस्वीर मेरे दिल में बसी है लेकिन

चीर कर दिल को मेरी जान दिखाऊँ कैसे


…..… 2122/1122/1122/22…………

कितने अल्फाज़ मचलते हैं सँवरने के लिए

जब ख़्यालों में कोई  शेर उभर आता है  



38

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अपने हर ग़म को वो अश्कों में पिरो लेती है

बेटी मुफ़लिस की खुले घर में भी सो लेती है


तब छलक पड़ते हैं आँखों से मेरे भी आँसू  

जब मेरी लख़्त-ए-जिगर आँख भिगो लेती है

 

मैं अकेला नहीं रोता हूँ शबे-फ़ुर्कत में 

मेरी तन्हाई मेरे साथ में रो लेती है 


 अपने आँसू वो छुपा लेती है ख़ुशियों के तले

अपनी हसरत को तब्बसुम से भिगो लेती है


अपने दुःख दर्द को मैला नहीं रहने देती 

अपने अश्कों से वो हर दर्द को धो लेती है

 

जब भी ख़ुश हो के निकलता हूँ ‘रज़ा’ मैं घर से 

मेरी मायूसी मेरे साथ में हो लेती है


—— 2122/1122/1122/22——-

मेरे बदन पे ख़ुशबू की चादर वो डाल कर 

अपनी मुहब्बतों में गिरफ़्तार कर लिए

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मुफ़लिस-ग़रीब। लख़्त-ए-जिगर-बेटा या बेटी,

शब-ए-हिज्राँ- वियोग की रात 


39

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ज़िंदगी से मुस्कुरा कर चल दिए

मौत को अपना बना कर चल दिए

 

उम्र भर की दोस्ती जाती रही

आप ये क्या गुल खिला कर चल दिए

 

अब यकीं उन की ज़बाँ का क्या करें

जो फ़क़त सपने दिखा कर चल दिए

 

आज उन का दिल दुखा शायद बहुत

बज़्म से आँसू बहा कर चल दिए

 

बे-बसी में और क्या करते  'रज़ा'

दर्द-ओ-ग़म अपना छुपा कर चल दिए


…..… 2122 2122 212……

रौनक़ें नही जातीं मेरे घर के आँगन से

दिल अगर नहीं बँटता , घर बँटा नहीं होता

…………………………………

यकीं-भरोसा। ज़बाँ-बात। फ़क़त-सिर्फ़। बज़्म-महफ़िल



40

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इस तरह राह में बे-साख़्ता आना तेरा

लोग बन सकते हैं नाहक ही निशाना तेरा


मेरी आँखों में हुआ जब से ठिकाना तेरा 

लोग कहते हैं सरे-‘आम दिवाना तेरा


रोज़ मिलने की तसल्ली न दिया कर मुझ को 

जान ले लेगा किसी रोज़ बहाना तेरा


छीन ही लेगा मेरा होश यक़ीनन इक दिन 

यूँ ख़यालों में शबो-रोज़ का आना तेरा 


भूल पाना बड़ा मुश्किल है वो दिलकश मंज़र

मुस्कुरा कर लबे-नाज़ुक को दबाना तेरा


अब तो आँखों से मेरी नींद का रिश्ता भी गया

ख़ूँ रुलाता है मुझे छोड़ के जाना तेरा


लोग महफ़िल में तुझे देख के हँसते हैं ‘रज़ा’

कितना दुश्वार हुआ दिल का लगाना तेरा


…..…… 2122/1122/1122/22………


बे-साख़्ता -अचानक, तसल्ली-दिलासा, शब-ओ-रोज़-रात दिन,  दिलकश मंज़र- दिल को लुभाने वाला दृश्य, लब-ए-नाज़ुक-कोमल होट, 

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salim raza rewa 

मेरे अपने कर रहे हैं, साथ मेरे छल बहुत salim raza reaa

मेरे  अपने  कर  रहे  हैं  साथ  मेरे  छल  बहुत ये घुटन अब खाए जाती है मुझे हर पल बहुत बज रही है कानों में अब तक तेरी पायल बहुत तेरी  यादें  क...