41
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ग़ुरबत के शहर में कभी आ कर तो देखिए
मुफ़्लिस को भी गले से लगा कर तो देखिए
खिल जाएगा ख़ुशी से वो चेहरा गुलाब सा
रोते हुए को आप हँसा कर तो देखिए
इस का सिला मिलेगा ख़ुदा से बहुत बड़ा
भूखे को आप रोटी खिला कर तो देखिए
वो शख़्स जिस ने आप का हर ग़म छुपा लिया
उस के ग़मों से गर्द हटा कर तो देखिए
मिलते नहीं हैं रोज़ मुहब्बत में ऐसे लोग
इक बार ख़ुद को उनका बना कर तो देखिए
उस की महक से महकेगा संसार आप का
उजड़े हुए चमन को बसा कर तो देखिए
इक चौंदवी का चाँद नज़र आएगा 'रज़ा'
चेहरे से उन के गेसू हटा कर तो देखिए
…………… 221/2121/1221/212…………..
ग़ुरबत-निर्धनता, ग़रीबी , मुफ़लिस-ग़रीब, गर्द-धूल, सिला-बदला, दरिया-ए-इश्क़-प्रेम की नदी,
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42
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यूँ मज़हबों में बँट के न संसार बाँटिये
कुछ बाँटना है आप को तो प्यार बाँटिये
नदियाँ बहें न ख़ून कि आँगन में फिर कभी
अपने ही घर में तीर न तलवार बाँटिये
हर धर्म के गुलों से महकता है ये वतन
ख़ंजर चला के आप न गुलज़ार बाँटिये
रहने भी दीजे ग़ुंचा-ओ-गुल को इसी तरह
गुलशन हरा-भरा है न श्रंगार बाँटिये
जब भी किसी से मिलिए ‘रज़ा’ मिलिए प्यार से
छोटी सी ज़िन्दगी में न तकरार बाँटिये
…………………एक शे’र…………………
यही ख़ुदा से दु’आ माँगता हूँ सुब्ह-ओ-शाम
कि मैं भी जी लूँ ज़माने में आदमी तरह
…… 221/2121/1221/212…..
ग़ुंचा-ओ-गुल- कली और फूल। तकरार-झगड़ा
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43
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जाने कैसे हैं ये आँसू बहते हैं तो बहने दो
भूली बिसरी बात पुरानी कहते हैं तो कहने दो
हम बंजारों को क्या कोई बाँध सका ज़ंजीरों में
मंज़िल-मंज़िल रोज़ भटकते रहते हैं तो रहने दो
मस्त-मगन अपनी ही धुन में रहते हैं दीवानों से
कहने वाले हम को पागल कहते हैं तो कहने दो
हम मजबूरों की मजबूरी सर्दी गर्मी बारिश क्या
रोटी की ख़ातिर सारे ग़म सहते हैं तो सहने दो
मेरे दुख को अपने सुख के साथ कहाँ ले जाओगे
इक दूजे से दूर अगर ये रहते हैं तो रहने दो
प्यार में उनके सुध-बुध खो कर हम हैं मालामाल 'रज़ा'
लोग हमे ‘आशिक़ आवारा कहते हैं तो कहने
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उस घर पे बलाओं का असर हो नहीं सकता
जिस घर में हो क़ुरआने मुक़द्दस की तिलावत
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44
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ख़ूबसूरत ज़िंदगानी हो गई
जब से उन की मेह्रबानी हो गई
रूठना, हँसना, मनाना, प्यार में
ज़िंदगी कितनी सुहानी हो गई
तूने माँगी ज़िंदगी, ले आज से
नाम तेरे ज़िंदगानी हो गई
इब्तिदा-ए-ज़िंदगी की सुब्ह से
शाम तक पूरी कहानी हो गई
खो गए मसरूफ़ियत की भीड़ में
ख़त्म इस में ज़िंदगानी हो गई
जिस की सुन्दरता पे मुझ को नाज़ था
वो भी कुटिया अब पुरानी हो गई
मेरे मौला लाज रख लेना मेरी
मेरी बिटिया अब सियानी हो गई
ना-ख़ुदा है ज़िंदगी का वो 'रज़ा'
पार अपनी ज़िंदगानी हो गई
रंगी-रंगीन।शब-रात। सौग़ात- भेट। इब्तिदा-ए-ज़िंदगी-ज़िंदगी की शुरुआत। मसरूफ़ियत- व्यस्ता । नाज़-घमंड।ना-ख़ुदा- नाविक।
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45
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जीने की आरज़ू तो है सब को ख़ुशी के साथ
ग़म भी लगे हुए हैं मगर ज़िन्दगी के साथ
दिलकश हसीं अदाओं की जादूगरी के साथ
दिल में उतर गया वो बड़ी सादगी के साथ
आएगा मुश्किलों में भी जीने का फ़न तुझे
कुछ दिन गुज़ार ले तू मेरी बे-बसी के साथ
संगत का कुछ असर तेरे लहजे में आ गया
लगता है रह रहा है भले आदमी के साथ
ख़ूने-जिगर निचोड़ के रखता हूँ शे’र में
यूँ ही नहीं है प्यार मुझे शा’इरी के साथ
अच्छी तरह से आपने जाना नहीं जिसे
यारी कभी न कीजिए उस आदमी के साथ
हरगिज़ वो ए'तिबार के लायक़ नहीं ‘रज़ा’
धोका किया है जिस ने हमेशा सभी के साथ
——-221/2121/1221/212—--
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आरज़ू -इच्छा, अभिलाषा, ऐ’तिबार-भरोसा
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46
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हँस दें तो खिलें कलियाँ गुलशन में बहार आए
वो ज़ुल्फ़ जो लहराएँ मौसम पे निखार आए
मिल जाए कोई साथी ग़म अपने सुना डालूँ
बेचैन मिरा दिल है पल भर तो क़रार आए
खिल जाएँगी ये कलियाँ महबूब की आमद से
गुलशन से जो वो गुज़रें गुलशन में बहार आए
जिन्हें तुम से मुहब्बत है जिन्हें तुम से अक़ीदत है
उन चाहने वालो में मेरा भी शुमार आए
फूलों को सजाया है पलकों को बिछाया है
ऐ बादे-सबा अब तो वो जाने बहार आए
शाख़ों में लचक तुम से बुलबुल में चहक तुम से
रुख़्सार पे कलियों के तुम से ही निखार आए
बादे-सबा- सुबह की हवा। रुख़्सार-चेहरे
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47
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जो भी बन कर रहता है इंसान सदा
उसके लब पे रहती है मुस्कान सदा
हक़ पे चलने वाले हक़ पे चलते हैं
उन को भी बहकाता है शैतान सदा
धीरे-धीरे शे’र मेरे भी चमकेगें
पढ़ता हूँ मैं ग़ालिब का दीवान सदा
रिज़्क़ में उस के बरकत हर-दम होती है
जिस के घर में आते हैं मेहमान सदा
जो नफ़रत से दूर हमेशा रहता है
महफ़िल में वो पाता है सम्मान सदा
…………………एक शे’र…………………
टूटा-फूटा गिरा-पड़ा कुछ तंग सही
अपना घर तो अपना ही घर होता है
………………………………………
हक़-सच्चाई। रिज़्क-रोज़ी कमाई।
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48
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साथ तुम नहीं होते कुछ मज़ा नहीं होता
मेरे घर में ख़ुशियों का सिलसिला नहीं होता
राह पर सदाक़त की मैं चला नहीं होता
सच हमेशा कहने का हौसला नहीं होता
रौनक़ें नहीं जातीं मेरे घर के आँगन से
दिल अगर नहीं बँटते घर बँटा नहीं होता
थोड़े ग़म, ख़ुशी थोड़ी थोड़ी सिसकियाँ भी हैं
ज़िन्दगी से अब हम को कुछ गिला नहीं होता
कोशिशों से देता है रास्ता समुंदर भी
हौसला रहे क़ाएम फिर तो क्या नहीं होता
डूबती नहीं कश्ती पास आ के साहिल के
बे-वफ़ा अगर मेरा ना-ख़ुदा नहीं होता
उस की शोख़ नज़रों ने ज़िन्दगी बदल डाली
वो अगर नहीं होता कुछ ‘रज़ा’ नहीं होता
……………… 212/1222/212/1222..……………..
सदाक़त- सच्चाई, क़ाएम-बना रहना। ना-ख़ुदा- नाविक।शोख़-हँसमुख।
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49
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तेरे दरबार में सब ख़ुशियों को पाने आए
तेरी रहमत के समुंदर में नहाने आए
शर्बते-दीद हम आँखों को पिलाने आए
अपनी बिगड़ी हुई तक़दीर बनाने आए
तेरे दीदार से आँखों को सुकूँ मिलता है
ख़ुद से कर-कर के कई बार बहाने आए
रक़्स करते हैं जिन्हें देख के जामो-मीना
मस्त नज़रों से वो ख़ुद जाम पिलाने आए
होश खो कर ही यहाँ मिलता है जीने का मज़ा
जोश वाले भी यहाँ होश लुटाने आए
हाथ जब उन का मेरे हाथों में आया तो लगा
जैसे इन हाथों में अनमोल ख़ज़ाने आए
——————2122/1122/1122/22——-———
शर्बत-ए-दीद-दीदार कीशर्बत, रश्क-ईर्षा,
जाम-प्याला, मीना-सुराही,जाम, शराब का प्याला,
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50
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दर-दर फिरते लोगों को दर दे मौला
बंजारों को भी अपना घर दे मौला
जो औरों की ख़ुशियों में ख़ुश होते हैं
उन का भी घर ख़ुशियों से भर दे मौला
ज़ुल्मो-सितम हों ख़त्म, न हो दहशत-गर्दी
अम्नो-अमाँ की, यूँ बारिश कर दे मौला
भूके प्यासे मुफ़्लिस और यतीम हैं जो
उन पर भी कुछ रहमो-करम कर दे मौला
जो करते हैं ख़ून-ख़राबा ज़ुल्मो-सितम
उन के भी दिल में थोड़ा डर दे मौला
नील-गगन में उड़ूँ परिंदों के जैसे
मुझ को भी वो ताक़त वो पर दे मौला
……………………………………
ख़ुशियाँ मुझ को ढूँढ रही हैं गलियों में
पर ग़म हैं जो घेरे - घेरे फिरते हैं
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ज़ुल्मो-सितम, अन्याय और अत्याचार, दहशतगर्दी- आतंक माहौल, अम्नो-अमाँ- सुख शांति, मुफ़लिस- निर्धन, नील-गगन -नीला आसमान,
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51
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वो इंसाँ तो मस्त क़लंदर होता है
जिस के अंदर प्यार का सागर होता है
मुश्किल में जो साथ रहे अपना बनकर
वो ही हमदम वो ही रहबर होता है
टूटा-फूटा गिरा-पड़ा कुछ तंग सही
अपना घर तो अपना ही घर होता है
दरिया,पंछी, पनघट, गागर, चौपालें
कितना सुंदर गाँव का मंज़र होता है
काम यहाँ क्या तीरों का तलवारों का
प्यार तो गोली-बम से बढ़कर होता है
जिस के अंदर दर्द नहीं अहसास नहीं
ऐसे इंसाँ का दिल पत्थर होता है
ज़र्रा अपनी मेहनत और मुक़द्दर से
बेशक़ इक दिन क़ीमती गौहर होता है
————22/22/22/22/22/2—————
(52)
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जब वो मेरे क़रीब आता है
सारी दुनिया को भूल जाता है
दास्ताँ अपनी जब सुनाता है
साथ में मुझ को भी रुलाता है
बारिशें आ के रौंद डालेंगी
रेत में क्यूँ महल बनाता है
कैसा पागल है जो अकेले में
मेरी ग़ज़लों को गुनगुनाता है
उस की दिलकश हसीन बातों से
दिल मेरा झूम-झूम जाता है
देख कर उस का ख़ुश-नुमा चेहरा
मेरे दिल को सुकून आता है
उस की ज़ुल्फ़ों से खेलने को ‘रज़ा’
दिल परिंदे सा फड़फड़ाता है
05/04/25
-——— 2122/1212/22 ———
53
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आप आते रहो आप जाते रहो
प्यास ऑंखों की मेरी बुझाते रहो
हुस्न का अपने जादू चलाते रहो
जब भी देखो मुझे मुस्कुराते रहो
दिल का वीरान गुलशन भी खिल जाएगा
ग़म की शाख़ों पे ख़ुशबू उगाते रहो
सारी हस्ती मिटा दो अँधेरों की तुम
बन के सूरज सदा जगमगाते रहो
आसमानों में ऊँची उड़ानें भरो
कामयाबी गले से लगाते रहो
बाग़बाँ बन के आओ मेरी ज़ीस्त में
दिल के गुलशन में ग़ुंचे खिलाते रहो
हर घड़ी ‘इश्क़ की रौशनी से ‘रज़ा’
तीरगी ज़िंदगी की मिटाते रहो
———— 212/212/212/212————
54
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बिन तेरे ज़िंदा हूँ लेकिन ज़िंदगी बे-नूर है
तुझ को पाने के लिए हर इक सज़ा मंज़ूर है
चाँद का टुकड़ा है या कोई परी या हूर है
उसके चेहरे से टपकता हर घड़ी इक नूर है
हुस्न पर तो नाज़ उस को ख़ूब था पहले से ही
आइने को देख कर वो और भी मग़रूर है
इस क़दर अल्लाह ने उस को बनाया ला-जवाब
उस के आगे हर हसीं शय फीकी है, बे-नूर है
सोच कर उसको ‘रज़ा’ उलझा हुआ है दिल मेरा
क्या करूँ, वो बेख़बर मुझ से बहुत ही दूर है
———— 2122/2122/2122/212————
………………एक शे’र…………………
आज भी उन की अदाओं में वही हैं शोख़ियाँ
आज भी तकते हैं रस्ता शह्र के पागल बहुत
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नूर-ज्योति, तेज, प्रकाश / नाज़- घमंड / मग़रूर-जिसे ग़ुरूर हो, घमंड/
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55
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वो दिल के बाग़ में मौजूद है कली की तरह
गुलों में रंग बहारों में ताज़गी की तरह
मेरे ख़यालों को करता है ख़ुश-नुमा हर पल
उसे दिमाग़ में रखता हूँ शा’इरी की तरह
उफ़ुक़ पे नूर बिखरने लगा फ़ज़ा महकी
ये कौन आया है महफ़िल में ज़िंदगी की तरह
अगर वो चाँद उतर आए मेरी छत पे कभी
अँधेरी रात भी चमकेगी चाँदनी की तरह
वो अपना दर्द तो हँस कर छुपा गया सब से
मगर ग़मों को जताता है वो ख़ुशी की तरह
तमाम उम्र समझता रहा जिन्हें अपना
गया जो वक़्त मिले वो भी अजनबी की तरह
यही दु’आ है मेरी रात-दिन ख़ुदा से ‘रज़ा’
कि मैं भी जी लूँ ज़माने में आदमी की तरह
————— 1212/1122/1212/112—————-
ख़ुश-नुमा,-आकर्षक, दिलकश,| उफ़ुक़_ आसमान का किनारा जो ज़मीन से मिला हुआ दिखाई देता है ।नूर_प्रकाश, रौशनी ।
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56
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साक़ी नहीं शराब नहीं जाम भी नहीं
उस के बग़ैर ज़िन्दगी ये ज़िन्दगी नहीं
वो क्या गए कि रौनक़े-महफ़िल चली गई
जलते तो हैं चिराग़ मगर रौशनी नहीं
चैनो-सुकून भी गए होशो-हवास भी
कैसे कहें कि उन की ये जादूगरी नहीं
उसके बग़ैर ज़ीस्त गुज़ारी तो ये लगा
मुझ में कमी है यार में कोई कमी नहीं
ये और बात है कि वो मिलते नहीं मगर
किस ने कहा कि उन से मेरी दोस्ती नहीं
हम तो ख़ताएँ अपनी ‘रज़ा’ ढूँढ़ते रहे
लेकिन ग़ुरूरे-यार में कोई कमी नहीं
————221/2121/1221/212———
जिस को पाकर मेरे दिल में आए ग़ुरूर
ऐसी दौलत की ख़्वाहिश नहीं है मुझे
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बे-ख़ुदी,-मदहोशी । वुजूद -अस्तित्व, जीवन, हस्ती। ज़ीस्त-ज़िंदगी । ग़ुरूर- घमंड
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57
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ग़रीबों की जमा’अत पर अमीरों की हुकूमत है
जिधर देखो उधर मेहनत-कशों की ख़स्ता हालत है
ग़रीबों के घरों में रहबरो देखो कभी जा कर
वहाँ ख़ुशियाँ नहीं हैं, कर्ब फ़ाक़ा और ग़ुरबत है
कहीं इस्मत फ़रोशी है कहीं नफ़रत कहीं दहशत
ज़माने में जिधर देखो क़ियामत ही क़ियामत है
कभी कलियों का मुस्काना कभी फूलों का मुरझाना
ये क़ुदरत के तक़ाज़े हैं यही गुलशन की क़िस्मत है
तेरे ड्रामे से क्या बदलेगी सच्चाई ज़माने की
फ़साना तो फ़साना है हक़ीक़त तो हक़ीक़त है
‘रज़ा’ आओ चलो, ग़ोता-ज़नी की मश्क़ करते हैं
समुन्दर की पनाहों में बड़ी अनमोल दौलत है
1222 1222 1222 1222
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जमा’अत- वर्ग,समूह, रहबरों-राह दिखने वालों, फ़ाक़ा और ग़ुरबत-खाना न होना ,ग़रीब होना, कर्ब-शारीरिक परेशानी और मानसिक दुःख, इस्मत फ़रोशी-जिस्म व्यापार, क़ुदरत के तक़ाज़े- प्राकृति की ज़रूरत, ग़ोताजनि कि मश्क़- गोता लगाने की प्रैक्टिस।
58
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तिरे दीदार का चस्का लगे है
तू आँखों को बड़ा अच्छा लगे है
भले ही तजरुबा कच्चा लगे है
मगर वो आदमी सच्चा लगे है
खपा दी ज़िंदगी ग़ुरबत में जिस ने
ख़ज़ाना भी उसे कचरा लगे है
मुसलसल गुफ़्तगू हो यार की तो
दिल-ए-बीमार को अच्छा लगे है
जो धोका खा चुका हो प्यार में तो
उसे हर आदमी झूठा लगे है
जहाँ सुनता न हो कोई तुम्हारी
वहाँ चुप रहना ही अच्छा लगे है
पकड़ पाता नहीं सच-झूठ तो फिर
मुझे ये आईना झूठा लगे है
जो फुँके ‘इश्क़ में घर-बार अपना
मुझे वो आदमी पगला लगे है
‘रज़ा’ खाओगे धोका तुम किसी दिन
तुम्हें हर आदमी अपना लगे है
22/01/24
———1222/1222/122———
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संगत का कुछ असर तेरे लहजे में आ गया
लगता है रह रहा है भले आदमी के साथ
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59
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दूर रहकर भी तुझे भूल नहीं पाएँगे
याद आएगी तो तड़पेंगे मचल जाएँगे
उम्र भर साथ निभाने का जो वा’दा कर ले
छोड़ कर सब को तेरे पास चले आएँगे
बिन तेरे साँस भी रुक-रुक के चला करती है
ऐसा लगता है तेरे हिज्र में मर जाएँगे
अपनी हालत पे अब आँसू भी हँसा करते हैं
कब तलक ऐसे ही रो-रो के जिए जाएँगे
उन के एल्बम में है तस्वीर पुरानी मेरी
अब वो देखेंगे तो पहचान नहीं पाएँगे
उन को फलदार अभी और ‘रज़ा’ होने दो
शाख़ के जैसे अभी और लचक जाएँगे
—————2122/1122/1122/22——————
मैं मनाऊँ तो भला कैसे मनाऊँ उस को
मेरा महबूब तो बच्चो सा मचल जाता है
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60
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अपनों से हम जाने कितने धोके खाए बैठे हैं
फिर भी वफ़ा की हम उन से उम्मीद लगाए बैठे हैं
बूढ़ी आँखों में भी कितने ख़्वाब सजाए बैठे हैं
जाने कब होंगे पूरे उम्मीद लगाए बैठे हैं
दिल की बात ज़ुबाँ तक आए ये ना-मुमकिन लगता है
ख़ामोशी में जाने कितने राज़ छुपाए बैठे हैं
किस को दिल का दर्द बताएँ किस को हाल सुनाएँ हम
ख़ुद ही अपनी मजबूरी का बोझ उठाये बैठे हैं
वो भी बदल जाएँगे इक दिन ऐसी हमें उम्मीद न थी
जिन के प्यार में हम अपना घर-बार लुटाए बैठे हैं
कौन है अपना कौन पराया कैसे ‘रज़ा’ पहचानोगे
चेहरों पर तो फ़र्ज़ी चेहरे लोग लगाए बैठे हैं
…..……………एक शे’र…………………
मैं ख़ुद गुनाहगार हूँ अपनी निगाह में
उसके ख़ुलूस-ओ-प्यार में कोई कमी नहीं
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SALIM RAZA REWA