ग़ज़ल का दायरा बेहद वसीअ (विस्तृत) और गहरा है। इस फ़न में जितना आगे बढ़ते जाइए, उतना ही एहसास होता है कि अभी बहुत कुछ जानना और सीखना बाक़ी है। यही ग़ज़ल की सबसे बड़ी ख़ूबी है कि हर नया मरहला इंसान के सामने इल्म, फ़िक्र और फ़न के नए दरवाज़े खोल देता है।
अगर यह पूछा जाए कि “ग़ज़ल क्या है?”, तो यक़ीनन इस मौज़ू पर एक नहीं, बल्कि अनेक किताबें लिखी जा सकती हैं। सदियों से अहल-ए-अदब, उस्तादान-ए-सुख़न और नक्क़ादीन-ए-अदब अपने-अपने अंदाज़ में इसकी तशरीह करते आए हैं।
मेरी कोशिश रहेगी कि इस वसीअ और पुरलुत्फ़ मौज़ू को आसान, मुख़्तसर और दिलनशीं अंदाज़ में आपके सामने पेश करूँ, ताकि हम सब मिलकर ग़ज़ल के फ़न, उसकी बारीकियों, उसकी रवायत और उसके हुस्न को बेहतर ढंग से समझ सकें।
आइए, आज से इस ख़ूबसूरत सफ़र की शुरुआत करते हैं।
⸻
लफ़्ज़ “ग़ज़ल” की अस्ल
“ग़ज़ल” अरबी ज़बान का लफ़्ज़ है। इसके एक मानी महबूब से बातचीत करना बताए जाते हैं। एक दूसरी मशहूर रिवायत के मुताबिक़ “ग़ज़ल” उस घायल हिरन की दर्दभरी पुकार का नाम है, जो शिकारी के तीर से ज़ख़्मी होकर अपने दर्द का इज़हार करता है।
शायद यही वजह है कि ग़ज़ल में मोहब्बत, हिज्र, विसाल, इंतज़ार, दर्द, तन्हाई और इंसानी जज़्बात की सबसे गहरी तर्जुमानी मिलती है।
⸻
ग़ज़ल का आग़ाज़
ग़ज़ल की इब्तिदा सातवीं सदी में अरब से मानी जाती है। इसकी बुनियाद अरबी ज़बान में पड़ी, जहाँ यह पहले क़सीदे के शुरुआती हिस्से “नसीब” के रूप में मौजूद थी। नसीब में महबूब की याद, जुदाई का दर्द और मोहब्बत के जज़्बात का बयान किया जाता था। धीरे-धीरे यही हिस्सा एक मुकम्मल और मुस्तक़िल सिन्फ़-ए-सुख़न की शक्ल में सामने आया, जिसे “ग़ज़ल” कहा गया।
अरबी ग़ज़ल के शुरुआती और सबसे प्रभावशाली शायरों में उमर इब्न अबी रबीआ का नाम लिया जाता है, जिन्होंने ग़ज़ल को एक स्वतंत्र साहित्यिक विधा के रूप में पहचान दिलाई।
इसके बाद ग़ज़ल फ़ारसी में पहुँची। वहाँ रूदकी, सनाई, निज़ामी, शेख़ सादी शीराज़ी, हाफ़िज़ शीराज़ी और मौलाना जलालुद्दीन रूमीजैसे महान शायरों ने इसे नई बुलंदियाँ अता कीं। फ़ारसी ग़ज़ल में इश्क़ के साथ-साथ तसव्वुफ़, रूहानियत और इंसानी फ़िक्र को भी ख़ास अहमियत मिली।
बारहवीं–तेरहवीं सदी में ग़ज़ल फ़ारसी के रास्ते हिंदुस्तान पहुँची। दिल्ली सल्तनत और सूफ़िया-ए-किराम की सरपरस्ती में इसे नई ज़मीन मिली। हज़रत अमीर ख़ुसरो ने फ़ारसी और हिंदवी के संगम से इस फ़न को नई दिशा दी और भारतीय तहज़ीब से इसे गहरा रिश्ता प्रदान किया।
इसके बाद सत्रहवीं सदी में वली मोहम्मद वली ‘वली दकनी’ ने उर्दू ग़ज़ल को बाक़ायदा नई पहचान दी। उन्हें “बानी-ए-उर्दू ग़ज़ल” और “बाबा-ए-रेख़्ता” कहा जाता है। उन्होंने ग़ज़ल को दरबारों से निकालकर आम लोगों की ज़बान और दिलों तक पहुँचाया।
उर्दू ग़ज़ल का सुनहरा दौर .... अगली चर्चा में..
Nest- Chapter No -02
No comments:
Post a Comment