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Monday, May 26, 2025

E 20 GAZLEN SALEEM RAZA REWA

ख़यालों का परिंदा 🦅 

81

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जानिबे-‘इश्क़ मेरी जाँ तुझे आना होगा

तेरी नज़रों में हसीं फिर ये ज़माना होगा


कोई रूठा है अगर उस को मनाना होगा

भूल कर शिकवा गले उस को लगाना होगा

 

जिन चराग़ों से ज़माने में उजाला फैले

उन चराग़ों को हवाओं से बचाना होगा

 

जिस की ख़ुशबू से महक जाए ज़माने की फ़ज़ा 

फूल गुलशन में कोई ऐसा खिलाना होगा

 

हर ख़ुशी छोड़ के मैं आउँगा तेरी ख़ातिर

शर्त ये है कि मेरा साथ निभाना होगा

 

चाहते हो कि मिटे सब के दिलों से नफ़रत 

दुश्मनों को भी  'रज़ा' दोस्त बनाना होगा

———2122/1122/1122/22———-

मेरा ख़ुलूस मेरी मुहब्बत को देखकर

जुड़ते गये हैं आ के मेरे कारवाँ  से लोग

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82

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जिसकी ख़ुशियों की ख़ातिर मैंने ये ज़माना छोड़ दिया 

इतना ख़फ़ा वो मुझ से हुआ कि आँख मिलाना छोड़ दिया


जब से तूने दिल को तोड़ा दिल का लगाना  छोड़ दिया

तेरी गलियों में भी तब से, आना-जाना छोड़ दिया


एक ही पाँसा फेक के तूने जीत लिया मेरा सब कुछ 

जिस दिन से मैं ख़ुद को हारा, दाँव लगाना छोड़ दिया


तेरे प्यार की लज़्ज़त को इन होंटो ने है जब से चखा 

और किसी का नाम फिर अपने लब पर लाना छोड़ दिया


तू ही मेरा ‘इश्क़-जुनूँ है, तू ही दिल की धड़कन है

तुझ को पा कर दुनिया का हर एक ख़ज़ाना छोड़ दिया


इस दर से ही मिल जाती है, 'इज़्ज़त, दौलत, शुहरत सब 

और किसी के दर पे ‘रज़ा’ अब आना जाना छोड़ दिया

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फिर ख़्वाहिशों ने सर को उठाया नहीं कभी

मजबूरियों ने ऐसे ठिकाने लगा दिया 


83

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मेरे वतन में आए हैं सारे जहाँ से लोग

रहते हैं इस ज़मीन पे अम्नो-अमाँ से लोग


लगता है कुछ ख़ुलूसो-मोहब्बत की है कमी

जो उठ के जा रहे हैं तेरे दरमियाँ से लोग


तेरे ख़ुलूस तेरी मोहब्बत को देखकर

जुड़ते गये हैं आ के  तेरे कारवाँ  से लोग


कैसा है क़ह्र कैसी तबाही मेरे ख़ुदा

बिछड़े हुए हैं अपनो से, अपने मकाँ से लोग


हिन्दी अगर है जिस्म तो उर्दू है उसकी जान 

करते हैं  प्यार आज भी  दोनों ज़बाँ से लोग


नज़्रे-फ़साद  होता रहा घर  मेरा 'रज़ा' 

निकले नहीं मुहल्ले में अपने मकाँ से लोग

————221/2121/1221/212———

रिज़्क में उस के बरकत होती रहती है

जिस के घर में आते हैं मेहमान सदा

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अम्नो-अमाँ- सुख चैन,  ख़ुलूस- स्नेह,  क़हर-क्रोध,  

नज़्र-ए-फ़साद-लड़ाई झगड़ा,  रिज़्क-खाने पीने की दौलत,  

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85

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अपनी उल्फ़त के सभी क़िस्से पुराने हो गए 

तुम सियाने हो गए हम भी सियाने हो गए 


चंद दिन के फ़ासले के बा’द हम जब भी मिले

यूँ लगा जैसे मिले, हम को ज़माने हो गए


अब भी है रग-रग में क़ाइम प्यार की ख़ुशबू जनाब

क्या हुआ जो जिस्म के कपड़े पुराने हो गए


डर-झिझक, शर्म-ओ-हया, पाबंदियाँ, रुसवाईयाँ

उन के शरमाने के, ये अच्छे बहाने हो गए


‘इश्क़ में सब कुछ गँवाकर फिर रहे हैं दर-बदर 

जो कभी महलों में थे अब बे-ठिकाने हो गए 


उस की यादों को सजा कर रख लिया संदूक में 

जा-ब-जा बिखरे हुए लम्हे ख़ज़ाने हो गए


मुस्कुराहट उन की, कैसे भूल पाएँगे  “रज़ा”

देखते ही इक नज़र, जिन के दिवाने हो गए 


—— 2122/2122/2122/212——

शर्म-ओ-हया -लाज और शर्म ।पाबंदियाँ -विवशता या लाचारी। शोख़ियाँ-चंचलता।


86

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रुख़्सार जहाँ में, कोई ऐसा नहीं होगा
उन से तो हसीं चाँद का चेहरा नहीं होगा


तुम चाँद सितारों की चमक में रहे उलझे
तुम ने  मेरे महबूब को देखा नहीं  होगा

अल्लाह के महबूब पे है ख़त्म नुबुव्वत 
अब कोई नबी दुनिया में पैदा नहीं होगा 


हैं कौन भला सर पे, बलाएँ जो लें मेरी 
कोई भी तो माँ-बाप के जैसा नहीं होगा

जो मेरे दिलो-जान को कर पाए मु'अत्तर
गुलशन में कोई फूल भी ऐसा नहीं  होगा

दिल खोल के करता है मोहब्बत जो किसी से 
दुनिया में  ‘रज़ा’ वो कभी रुसवा नहीं  होगा


221/1221/1221/122

…………………ए शे’र…………………

ये चाँद सितारे ये ज़मीं फूल ये  ख़ुशबू 

हर चीज़ बनी है मेरे सरकार के सदक़े

………………………………………………

रुख़्सार- चेहरा, बलाएँ- परेशानियाँ, मो'अत्तर- ख़ुशबूदार,

 नुबुव्वत-पैग़म्बरी, सदक़े-बदौलत, 


87


——————18/01/24——————


तुझ को डाँटूँ या तुझे प्यार करूँ मैं पहले

कौन से जज़्बे का इज़हार करूँ मैं पहले


मैं ग़लत काम की तरग़ीब दिलाऊँ तुझ को 

यानी ख़ुद को ही गुनहगार करूँ मैं पहले


ज़ख़्म सिलने में कई ज़ख़्म दिए टाँकों ने

कौन से दर्द का इज़हार करूँ मैं पहले


चोट खाया है मेरे जिस्म का हर इक हिस्सा

कौन से हिस्से का उपचार करूँ मैं पहले


उस की ख़ामोश निगाहों ने जो बातें की हैं 

दिल ये कहता है वो इज़हार करूँ मैं पहले


फिर तो मुमक़िन ही नहीं  है कोई झगड़ा प्यारे

तू अगर चाहता है वार करूँ मैं पहले


मेरा महबूब ही तकलीफ़ का सामाँ है ‘रज़ा’

उस को समझाऊँ या तकरार करूँ मैं पहले?

—— 2122/1122/1122/22———

तर्ग़ीब-किसी बुराई के लिए उकसना, इज़हार-बयान या गुफ़्तगू , तकरार-झगड़ाया विवाद, 


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88

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सुख वो देता, दुख वो देता, फिर काहे का रोना है

दौलत वो दे, शुहरत वो दे, क्या पाना, क्या खोना है


चाँद-सितारे उस से रौशन, फूलों में उस से ख़ुशबू 

हर ज़र्रे में उस की क़ुदरत वो चाँदी वो सोना है


सारी दुनिया का वो मालिक, हर शय उस के क़ब्ज़े में

उस के आगे सब कुछ फीका, क्या जादू, क्या टोना है


गॉड, ख़ुदा, हम उस को बोलें या ईश्वर-अल्लाह कहें

वो ख़ालिक़ है, वो मालिक है, उस का कोना-कोना है


ख़ुशियों के वो मोती भर दे, या ग़म की बरसात करे

वो दाता है सारे जग का, जो चाहे, सो होना है


इक रस्ता जो बंद किया तो दस रस्ते वो खोलेगा

उस पे भरोसा रख तू, प्यारे, जो लिक्खा, सो होना है


साँसों पे उस का है पहरा  धड़कन है उस के दम से

जिस्म ‘रज़ा’ है मिट्टी का फिर क्या रोना क्या धोना है


———-22/22/22/22/22/22/22/2———

ज़र्रे-ज़र्रे में- कण कण में। हर-शय-हर चीज़ _________________________ 

89

    —————01-01-24————-


कभी तो ख़ुद में ही ढलने को जंग करता हूँ

कभी मैं ख़ुद को बदलने को जंग करता हूँ


दिलो-दिमाग़ की आपस में जब नहीं बनती

तो इन के साथ, मैं चलने को जंग करता हूँ


मेरा ग़ुरूर मेरे रास्ते में जब आए 

तो उस की हस्ती कुचलने को जंग करता हूँ


ग़मों की भीड़ ने घेरा है चारों जानिब से

मैं गिर रहा हूँ, सँभलने को जंग करता हूँ


जफ़ा-ए-वक़्त ने, पैरों को बाँध रक्खा है

वफ़ा के साथ, मैं चलने को जंग करता हूँ


कुरेदती है तेरी याद मेरे ज़ख्मों को

मैं इस की ज़द से निकलने को जंग करता हूँ


    ——— 1212/1122/1212/22———

    कोशिश तो की भँवर ने डुबोने की बारहा

    हम कश्ती-ए-हयात बचाते चले  गए

    —————-

ज़मीर-अन्तरात्मा,  वफ़ा-सच्चाई, ग़ुरूर-घमंड, 

कुरेदती-खुरचना या उकेरना, हयात-ज़िन्दगी,

ज़द-आघात,निशाने 

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90

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रुख़ से जो मेरे यार ने पर्दा हटा दिया

महफ़िल में हुस्न वालों को पागल बना दिया


देखा जो उसने प्यार से बस इक नज़र हमें

दिल में हमारे प्यार का गुलशन खिला दिया


उस गुलबदन ने मुझ को छुआ इस अदा के साथ

पतझड़ में भी बहार का मंज़र दिखा दिया


कितने अमीरे-शहर थे,  बर्बाद हो गए

'ऐयाशियों ने कितने घरों को मिटा दिया


जिस की वफ़ा पे मुझ को भरोसा था बे-पनाह

उस ने ही सब के बीच तमाशा बना दिया


महफ़िल में हुस्न वाले भी ख़ामोश हो गए

ज़िक्रे-जमाले-यार ने जलवा दिखा दिया


उस की नज़ाकतों पे नहीं जाइये ‘रज़ा’

उस ने अमीरे-शह्र का नक़्शा मिटा दिया

10/04/25


———— 221/2121/1221/212———


91

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कौन कहता है बस नज़र तक है 

वार  उन का  मेरे जिगर तक है 


मस्त नज़रों की हद जिधर तक है 

ख़ूबसूरत फ़ज़ा उधर तक है 


चाँद निकला है मेरे आँगन  में 

रौशनी उस की बामो-दर तक है 


जिस्मे-नाज़ुक की संदली ख़ुशबू 

‘इश्क़ की शाम से सहर तक है


ग़म ख़ुशी ज़िंदगी के हिस्से हैं

साथ इन का तो ‘उम्र भर तक है


ऐसा लिपटा है वो बदन से मेरे 

उस की ख़ुशबू ‘रज़ा’ जिगर तक है 

———2122/1212/22———

जो  ज़ख़्म खा के भी है सनम आप का सदा

उस दिल पे फिर से आपने ख़ंजर चला दिया 

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जिगर-कलेजा,  हद-सीमा, फ़ज़ा-वातावरण, संदल- चन्दन, मौसम बाम-छत,  दर- दरवाज़ा, सहर-सुबह,

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92

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सच का साथ भला कैसे दे पाएगा 

जो एहसाँ के बोझ तले दब जाएगा 


जब सच का आईना शोर मचाएगा 

शर्म से तू पानी-पानी हो जाएगा 


सारी दुनिया में थू-थू हो जाएगी 

जिस दिन तेरा झूठ पकड़ में आएगा 


मेरे पाँव  के  छाले  मुझ  से  कहते  हैं 

कब तक उस की खोज में चलता जाएगा 


उस  दिन मेरी तन्हाई का होगा क़त्ल 

जिस दिन तू मेरी धड़कन बन जाएगा 


जैसा हम बोएँगे , वैसा काटेंगे 

कर्मों का फल तो हर कोई पाएगा


उस के सारे ग़म धुँदले पड़ जाएँगे 

जिस को मुश्किल में जीना आ जाएगा


मुझ को तो काँटों पर चलना आता है 

इन राहों पर क्या तू भी चल पाएगा 


क्यूँ दौलत पे लोग ‘रज़ा’ इतराते हैं

एक दिन सब कुछ मिट्टी में मिल जाएगा 

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जब तिरी दीद को मैं शह्र में तेरे पहुँचूँ 

मेरे दामन से न लिपटा कोई इल्ज़ाम रहे


93

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दिल की गलियों में आया कर 

पर सब को मत बतलाया कर


हर दिन मिलना ठीक नहीं है 

दिल पागल है, समझाया कर


सच भी तेरा झूट लगेगा 

इतनी क़समें मत खाया कर


आ कर इस दिल के गुलशन में 

फूल के जैसा खिल जाया कर 


घुल कर अच्छों की सुहबत में

तू भी अच्छा हो जाया कर


दिल की बात ‘रज़ा’ पढ़ लेगा

सब कुछ सच-सच बतलाया कर

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तेरे दीदार से आँखों को सुकूँ मिलता है

ख़ुद से हम कर के कई बार बहाने आए 


94

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‘इश्क़ तुम से किया नहीं होता

ज़िन्दगी में मज़ा नहीं होता


तू अगर बा-वफ़ा नहीं होता

दिल ये तुझ पे फ़िदा नहीं होता   


रात तुझ बिन हसीं नहीं होती 

दिन भी ये ख़ुश-नुमा नहीं होता 


ज़िंदगानी सँवर गई होती

तू जो मुझ से जुदा नहीं होता


तेरी चाहत ने कर दिया पागल

प्यार इतना किया नहीं  होता


वक़्त मजबूर करता है वरना 

कोई इंसाँ बुरा नही होता


चोट खाएँ भी मुस्कुराएँ भी

अब ‘रज़ा’ हौसला नहीं होता

——— 2122/1212/22———

95

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दूर जितना वो मुझ से जाएँगे

मुझ को उतना क़रीब पाएँगे

 

कुछ न होगा तो आँखें नम होंगी

दोस्त बिछड़े जो याद आएँगे


वक़्त अब करवटें बदलने लगा

अब तो अपने नज़र चुराएँगे


माना पतझड़ में हम हुए वीराँ

अब के सावन में  लहलहाएँगे


‘इश्क़ रब की हसीन ने’मत है 

इसको ज़ालिम मिटा न पाएँगे 


रूठ कर मुझ से वो गए हैं मगर

मुझ को कैसे वो भूल पाएँगे


ख़ौफ़, तन्हाई, दर्द , मायूसी

कैसे इन को “रज़ा” मिटाएँगे


—— 2122/1212/22 —


ने’मत-दौलत, उपहार, ज़ालिम-ज़ुल्म करने वाले,

 ख़ौफ़-डर, 

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96

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बातों ही बातों में उनसे प्यार हुआ

ये मत पूछो कैसे कब इक़रार हुआ


दिल की बातें वो ऐसे पढ़  लेते हैं 

दिल न हुआ जैसे कोई अख़बार हुआ


ढेरों पाबंदी हैं,  मेरे जीने में 

इत नी शर्तों पर, जीना दुश्वार हुआ 

 

उन से ही ख़ुशियाँ हैं मेरे आँगन में

उन से ही रौशन मेरा संसार हुआ


फूलों से तो प्यार करे है हर कोई 

इस दिल को तो काँटों से भी प्यार हुआ 


वो मेरा तन-मन है, प्राण पखेरू है

उस से ही इस जीवन का उद्धार हुआ


जब से वो आँखों से मेरी दूर हुए 

तब से 'रज़ा' जीना मेरा दुश्वार हुआ


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97

    —————————————-

जब वो क़समें हमारी खाते हैं 

सच यक़ीनन कोई छुपाते हैं


लोग तो लोग हैं सताते हैं 

आप क्यूँ दिल मेरा दुखाते हैं 


ज़िंदगी की थकन उतारनी है 

आओ कुछ देर गुनगुनाते हैं 


जब तू आँखों से दूर होता है

कैसे-कैसे ख़याल आते हैं


छोड़ जाएँगे हम तुझे तन्हा

रोज़ कह कर यही डराते हैं


हाल उन का किसी ने पूछा क्या?

चोट खा कर जो मुस्कुराते  हैं


बचपना आप का गया ही नहीं

आप बच्चों सा रूठ जाते हैं


जिन को मैंने अदब सिखाया था 

वो मुझे नाम से बुलाते हैं 


मुझ से नाराज़ हैं 'रज़ा' वो मगर 

मेरी ग़ज़लों को गुनगुनाते हैं

———2122/1212/22———-


उसकी महक से महकेगा संसार आपका

उजड़े हुए चमन को बसा कर तो देखिए


98

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वो लबो-रुख़सार वो रंगत सुहानी अब कहाँ

वो हसीं क़ातिल अदाएँ वो जवानी अब कहाँ


बा'इसे-बरकत थे मेहमाँ मेज़बानों के लिए 

अब कहाँ मेहमान, ऐसी मेज़बानी अब कहाँ


दोस्तों के साथ में छुपना-छुपाना खेलना

वो सुहाने पल कहाँ, यादें सुहानी अब कहाँ


थप-थपाकर, गुन-गुनाकर मुझ को बहलाती थीं जो

लोरियाँ दादी की, नानी की कहानी अब कहाँ


गुलशने-दिल का वो माली खो गया जाने किधर

वो नहीं तो ज़िन्दगी में गुल-फ़िशानी अब कहाँ


जिन के साये में “रज़ा” आता था जीने का मज़ा 

शहर में मिट्टी का घर, छप्पर वो छानी अब कहाँ


———-2122/2122/2122/212———-

मेरे दुख को अपने सुख के साथ कहाँ ले जाओगे

इक दूजे से दूर अगर ये रहते हैं तो रहने दो

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क़ातिल-जानलेवा, रूख़्सार-चेहरा, बा'इस-ए-बरकत- मुनाफ़े का सौदा, मेज़बान -अतिथि,  मेज़बानी-अतिथि सत्कार, ग़ुंचा-ओ-गुल-कली और फूल। छप्पर वो छानी-घास फूँस की छत, गुल-फ़िशानी-फूलों का बरसना 


99

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ग़मों की लज़्ज़त चुरा के ले जा मेरी मसर्रत चुरा के ले जा

तू ज़ौक़े-उल्फ़त चुरा के ले जा या दिल की हसरत चुरा के ले जा


क़दम क़दम पर उजाला बन कर ये साथ देंगी तेरा हमेशा

मेरी सख़ावत चुरा के ले जा मेरी शराफ़त चुरा के ले जा


बना सके तो बना ले कोई हमारे जैसा तू एक चेहरा

हमारी सूरत चुरा के ले जा हमारी रंगत चुरा के ले जा


करम का गुलशन खिलेगा इक दिन मुझे भरोसा है मेरे रब पर

भले ये हिम्मत चुरा के ले जा भले ही ताक़त चुरा के ले जा


ये मेरी धड़कन ये मेरी साँसें ये जिस्म मेरा हैं ये अमानत

तू मेरी दौलत चुरा के ले जा तू मेरी शुहरत चुरा के ले जा


मेरा हुनर तो ‘अता-ए-रब है इसे चुराना “रज़ा” है मुश्किल

तू मेरी आदत चुरा के ले जा तू मेरी फ़ितरत चुरा के ले जा


——12122/12122/12122/12122—-

अब तो ज़ुबाँ में पहली सी ताक़त नहीं रही

लज़्ज़त मगर वही है सुख़न में अभी तलक

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लज़्ज़त-मज़ा, मसर्रत-ख़ुशी, ज़ौक़े-उल्फ़त-प्यार का मज़ा, 

हसरत-अरमान, इच्छा, सख़ावत-दरिया दिली, दानशीलता, 

शराफ़त-सज्जनता, शालीनता, रंगत-चेहरे का रंग, अता-ए-रब, ख़ुदा की देन, 


100

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लब तुम्हारी मोहब्बत में खो जाएँगे बिगड़ी क़िस्मत यक़ीनन सँवर जाएगी

जब तुम्हारी मोहब्बत में खो जाएँगे बिगड़ी क़िस्मत यक़ीनन सँवर जाएगी


चाँदनी रात हो तुम मेरे साथ हो, हाथ में हाथ हो प्यार की बात हो

तब तुम्हारी मोहब्बत में खो जाएँगे, बिगड़ी क़िस्मत यक़ीनन सँवर जाएगी


हम गुनहगार हैं, हम सियह-कार हैं, फिर भी रहमो-करम के तलबगार हैं 

जब तुम्हारी मोहब्बत में खो जाएँगे, बिगड़ी क़िस्मत यक़ीनन सँवर जाएगी


उम्र भर दर-बदर हम भटकते रहे, तुम न थे ज़िंदगी में तो कुछ भी न था 

अब तुम्हारी मोहब्बत में खो जाएँगे, बिगड़ी क़िस्मत यक़ीनन सँवर जाएगी


हम ही क्या चाँद तारे ये काली घटा, ग़ुंचा-ओ-गुल ये बुलबुल ये शा’इर ‘रज़ा’

सब तुम्हारी मोहब्बत में खो जाएँगे, बिगड़ी क़िस्मत यक़ीनन सँवर जाएगी

…………… 212/212/212/212 ….…………

दिल की बातें वो  ऐसे पढ़  लेता है

दिल न हुआ जैसे कोई अख़बार हुआ

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सियह कार-दुर्जन,पापी,  तलबगार-अभिलाषी, फिज़ा-वातावरण,  गूंचा ओ गुल-कली और फूल, 

 ———————11/17——————-

SALIM  RAZA REWA 

मेरे अपने कर रहे हैं, साथ मेरे छल बहुत salim raza reaa

मेरे  अपने  कर  रहे  हैं  साथ  मेरे  छल  बहुत ये घुटन अब खाए जाती है मुझे हर पल बहुत बज रही है कानों में अब तक तेरी पायल बहुत तेरी  यादें  क...