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01
शादाब, जिनकी ख़ुशबू से हर इक गुलाब है
रौशन, चमक से जिनकी “रज़ा” आफ़ताब है
सूरत, वो जिसपे नाज़ है, कुल काएनात को
वो सूरत-ए-रसूल, ख़ुदा की किताब है
شاداب جنکی خوشبو سے ہر اک گُلاب ہے
روشن چمک سے جنکی رضاؔ آفتاب ہے
صورت وہ جسپے ناز ہے کُل کائنات کو
وو صورتِ رَسُول ؐ خدا کی کِتاب ہے
उनके दर पर सलाम कह देना
मैं हूँ उनका ग़ुलाम कह देना
उनसे मिलने की दिल में ख़्वाहिश है
मेरा इतना पयाम कह देना
اُنکے در پر سلام کہہ دینا
میں ہوں اُنکا غُلام کہہ دینا
اُنسے مِلنے کی دِل میں خواہش ہے
میرا اتنا پیام کہہ دینا
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03
नबी-ए-पाक, रसूल-ए- ख़ुदा के सदक़े में
हबीब-ए-किब्रिया, ख़ैर-उल-वरा के सदक़े में
दुआएँ उनकी यक़ीनन क़ुबूल होंगी रज़ा
जो माँगते हैं दुआ मुस्तफ़ा के सदक़े में
نبیِ ؐ پاک رسوِل خدا کے صدقے میں
حبیبِ کِبریا ، خیرولوارا کے صدقے میں
دعائیں اُنکی یقیناً قُبول ہونگی رضا ؔ
جو مانگتے ہیں دُعا مصطفٰی ؑ کے صدقے میں
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मैं अपने आप से बाहर निकलकर
तेरे साँचे में ढलना चाहता हूँ
तेरे दामन से कुछ ख़ुशियाँ उठाकर
ग़मों का सर कुचलना चाहता हूँ
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04
फफ़ोले पड़ चुकी आँखों में, ज़ौक़-ए-दीद बाक़ी है
बहुत है दूर तू मुझसे, मगर उम्मीद बाक़ी है
मेरी जाँ लौट के आजा, दिल-ए-बीमार की ख़ातिर
सभी की हो गई है ईद, मेरी ईद बाक़ी है
فَفولے پڑ چکی آنکھوں میں، ذوقِ دید باقی ہے
بہت ہے دُور تُو مجھ سے، مگر امید باقی ہے
میری جاں لوٹ کے آجا، دلِ بیمار کی خاطر
سبھی کی ہو گئی ہے عید، میری عید باقی ہ
15/04/25
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05
मैंने हर-एक उम्मीद का पुतला जला दिया
दुश्वारियों को पाँव के नीचे दबा दिया
मेरी तमाम उँगलियाँ घायल तो हो गईं
लेकिन तुम्हारी याद का नक़्शा मिटा दिया
مینے ہر اک اُمید کا پتلا جلا دیا
دشواریوں کو پانو کے نیچے دبا دِیا
میری تمام اُنگلیاں گھائل تو ہو گئیں
لیکِن تمہاری یاد کا نقشہ مِٹا دِیا
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06
ढल गई अब तो जवानी जिस्म बूढ़ा हो गया
पर तुम्हारे प्यार को बूढ़ा नहीं होने दिया
तुमने भी वादा निभाया इस क़दर की उम्र भर
मुझको पागल कर के फिर अच्छा नहीं होने दिया
ڈھل گئی اب تو جوانی جسم بوڑھا ہو گیا
پر تمہارے پیار کو بوتھا نہیں ہونے دیا
تمنے بھی وعدہ نبھایا اس قدر کی عمر بھر
مجھکو پاگل کر کے فِر اچھا نہیں ہونے دیا
24/03/24
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07
शर्तों पर ही प्यार करोगे ऐसा क्या
तुम जीना दुश्वार करोगे ऐसा क्या
लोगों ने तो ज़ख़्म दिए हैं चुन चुन कर
तुम भी दिल पर वार करोगे ऐसा क्या
شرطوں پر ہی پیار کرو گے ایسا کیا؟
تم جینا دشوار کرو گے ایسا کیا؟
لوگوں نے تو زخم دیے ہیں چن چن کر
تم بھی دل پر وار کرو گے ایسا کیا؟
❣️27/01/24
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08
बन के मेहमान उसकी ग़ुरबत का
लज़्ज़त-ए ग़म को चख के आया हूँ
क़ैद करने को हर अदा उसकी
आँखें चौखट पे रख के आया हूँ
بن کے مہمان اسکی غربت کا
لذّتِ غم کو چکھ کے آیا ہوں
قید کر نے کو ہر ادا اسکی
آنکھیں چوکھٹ پہ رکھ کے آیا ہوں
❣️16/01/24
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09
इलाज -ए-इश्क़ मुसलसल जो कर गए होते
दिलों के ज़ख़्म यक़ीनन ही भर गए होते
तुम्हारे इश्क़ ने मुझको बचा लिया वर्ना
ग़म-ए-हयात से अब तक तो मर गए होते
علاج عشق مُسلسل جو کر گئے ہوتے
دلوں کے زخم یقیناً ہی بھر گئے ہوتے
تمہارے عشقت نے مجھکو بچت لیا ورنہ
غم حیات سے اب تک تو مر گئے ہوتے
01/01/24
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10
हद से गुज़र गई हैं ख़ताएँ, तो क्या करें
ऐसे में उन से दूर ना जाएँ तो क्या करें
उसकी अना ने, सारे त’अल्लुक़ मिटा दिए
उस बे-वफ़ा को भूल न जाएँ तो क्या करें
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11
हाथो में तेरे हमदम जादू नहीं तो क्या है
मिट्टी को तू ने छूकर सोना बना दिया है
उस दिन से जाने कितनी नज़रें लगी हैं मुझ पर
जिस दिन से तूने मुझको अपना बना लिया है
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12
नही कुछ भी छुपाना चाहिए था
अगर ग़म था बताना चाहिए था
मेरी ख़्वाहिश थी बस दो गज़ ज़मीं की
उन्हें सारा ज़माना चाहिए था
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13
समुंदर को कहाँ ख़ुश्की का डर है
वो नदिया हैं जो अक्सर सूखती हैं
अमीर-ए-शहर के ,क़ब्ज़े हैं लेकिन
ग़रीबों की दीवारें टूटती हैं
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14
नूर चेहरे से यूँ छलकता है
जैसे सूरज कोई चमकता है
एक दिन ख़्वाब में वो क्या आया
घर मेरा अब तलक महकता है
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15
चाँद का टुकड़ा है या कोई परी या हूर है
उसके चहरे से छलकता हर घड़ी इक नूर है
हुस्न पर तो नाज़ उसको ख़ूब था पहले से ही
आइने को देख कर वो और भी मग़रूर है
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16
ज़िन्दगी का फैसला हो जाएगा
तू सनम जिस दिन मेरा हो जाएगा
प्यार की, कुछ बूँद ही मिल जाए तो
गुलशन-ए-दिल फिर हरा हो जाएगा
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17
धूप का बिस्तर लगाकर सो गए
छाँव सिरहाने दबाकर सो गए
गुफ़्तगू की दिल मे ख़्वाहिश थी मगर
वो मेरे ख़्वाबों में आकर सो गए
फ़रेब-ओ ज़ुल्म, गुनाह-ओ- ख़ता से डरते हैं
जिन्हे है ख़ौफ़-ए-ख़ुदा वो ख़ुदा से डरते हैं
किसी ग़रीब की आह-ए-जिगर न लग जाए
इसीलिए तो हर-इक बद्दुआ से डरते हैं
فریب و ظلم، گناہ و خطا سے ڈرتے ہیں
جنہیں ہے خوفِ خدا، وہ خدا سے ڈرتے ہیں
کسی غریب کی آہِ جگر نہ لگ جائے
اسی لیے تو ہر اِک بددُعا سے ڈرتے ہیں
जब वो हँसता है तो, खिल जाते हैं ग़ुंचे दिल के
अपनी बातों से दिल-ओ-जान को महकाता है
दूर हो जाती है दिनभर की थकन पल भर में
जब मेरा लख़्त-ए-जिगर मुझसे लिपट जाता है
कोशिशे बेकार होती जा रही हैं आज कल
मुश्किलें भरमार होती जा रही हैं आज कल
चाहिए इनको हमेशा अब दवाओं की ख़ुराक
ख़्वाहिशें बीमार होती जा रही हैं आज कल
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