"सलीम ‘रज़ा’ की शायरी : या'नी ज़िंदगी से संवाद"
सलीम 'रज़ा' की शा’इरी समकालीन ग़ज़ल में एक शांत, सधी हुई और सच्ची आवाज़ है। इसमें न दिखावा है, न शोर, न कोई ज़बान की कलाबाज़ी, न अल्फ़ाज़ की बेजा सजावट। बल्कि एक ऐसा भावात्मक संवाद है जो सीधे दिल से निकलता है और दिल तक पहुँचता है। उनकी शा’इरी पाठक से किसी नारे की तरह नहीं बोलती, बल्कि धीरे से उसे सोचने के लिए आमंत्रित करती है।
उनकी पहली किताब "ख़यालों का परिंदा" में शामिल ग़ज़लें इसी आत्मीय शैली का प्रतिनिधित्व करती हैं। इन ग़ज़लों में एक कल्पनाशील परिंदा है, जो कभी मोहब्बत की ऊँचाइयों में उड़ान भरता है, कभी ज़िंदगी की सच्चाइयों से टकराता है।
‘रज़ा’ के शे’र सादा मगर पुरअसर हैं, एक शे’र देखिये,
"मैं जिसके प्यार को अब तक समझ नहीं पाया,
वो रात-रात मेरा इंतज़ार करता है।"
यह शे’र मोहब्बत की उस परत को खोलता है जो शब्दों से परे है, गहरी और ख़ामोश।
इसी तरह यह शे’र,
"सच को काग़ज़ पर उतारा इस तरह मैंने ‘रज़ा’,
सच लिखा और उसको शर्मिंदा नहीं होने दिया।"
यह शे’र शा’इर के दृष्टिकोण, उसकी ज़िम्मेदारी और लेखकीय ईमानदारी का बेहतरीन बयान है।
रज़ा की शा’इरी में परंपरा और आज के सामाजिक अनुभव साथ-साथ चलते हैं। वे न तो पुराने कथानकों से कटते हैं, न ही आज की ज़रूरतों से मुँह मोड़ते हैं। वे संबंधों की पाकीज़गी को भी ख़ुशबू की तरह महसूस करते हैं, यह शे’र देखिये,
"जिस तरह से फूलों की डालियाँ महकती हैं,
मेरे घर के आँगन में बेटियाँ महकती हैं।"
इसी तरह उनके कई शे’रों में ज़िंदगी की चुनौतियों का सामना करने का भरपूर जज़्बा दिखाई देता है,
"जी भर के मुझको नाच नचा ले ऐ ज़िंदगी,
मैंने भी घुँघरू बाँध लिये अपने पाँव में।"
उनका यह शे’र सिर्फ़ शब्दों का संकलन नहीं है, बल्कि यह एक रवैया है, जीवन को जैसा है वैसा स्वीकार करने का, और साथ ही हर हाल में उसके साथ चलने का संकल्प भी है।
कुल मिलाकर, सलीम 'रज़ा' की शा’इरी में सादगी है, संवेदनशीलता है और सबसे बढ़कर, ईमानदारी है। "ख़यालों का परिंदा" उनके इसी रचनात्मक सफ़र की पहली कड़ी है, जो निश्चय ही अच्छी शा’इरी पढ़ने वालों के लिए एक ख़ूबसूरत तोहफ़ा होगी। इस पुस्तक के प्रकाशन पर उन्हें हार्दिक शुभकामनाएँ।
डॉ. नुसरत मेहदी
निदेशक
मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी
संस्कृति विभाग मध्यप्रदेश