Sunday, November 1, 2026

बयाँ मैं कैसे करूँ अपनी ज़िंदगी की थकन

 

बयाँ मैं कैसे करूँ अपनी ज़िंदगी की थकन

तमाम रात सताती है बेबसी की थकन


सरों पे बोझ है हर वक़्त ज़िम्मेदारी का

सो जीते-जी नहीं जाएगी आदमी की थकन


तमाम दिन की मशक़्क़त से टूटता हूँ जब

बड़े सुकूँ से सुलाती है चाकरी की थकन


उड़ा के ले गई है मौत हर परेशानी

''नहीं है रुख़ पे पस-ए-मर्ग ज़िंदगी की थकन''


निगाह-ए-यार ने क्या घोल कर पिलाया था 

तमाम उम्र न उतरी ये आशिक़ी की थकन


उतार देता हूँ जब अपने दर्द-ओ-ग़म का लिबास

गले लगा के सुलाती है मुफ़्लिसी की थकन


नक़ाब चेहरे पे ख़ुशियों का डाल कर अपने

छुपा रहा है ‘रज़ा’ अपनी बेबसी की थकन

------Gazal by Saleem raza --------

ग़ज़ल की बह्र 

मुज्तस मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़

मुफ़ाइलुन फ़इलातुन मुफ़ाइलुन फ़इलुन

121211221212112



Saturday, October 31, 2026

मेरे बे-जान होंठों पर अगर नात-ए-नबी आए,

मेरे बे-जान होंठों पर अगर नात-ए-नबी आए,

मुअत्तर हों मेरी साँसें, रगों में ज़िंदगी आए।


ख़ुदा की रहमतें बरसें, करम की रौशनी आए,

घरों में जश्न-ए-आक़ा हो, तो हर घर में ख़ुशी आए।


दिलों में नूर भर जाए, गुनाहों में कमी आए,

नबी के ज़िक्र से अफ़कार में पाकीज़गी आए।


उठे जब भी क़लम मेरा, नबी की नात लिखने को,

मेरे लफ़्ज़ों से ख़ुशबू जन्नतुल-फ़िरदौस की आए।


न जाने कब मिरे दिल की दु'आ सरकार तक पहुँचे,

न जाने कब मुक़द्दर में मदीने की गली आए।


अगर ख़ाक-ए मदीना अपनी पलकों से लगा लूँ तो,

मिरी बे-नूर आँखों में नई इक रौशनी आए।


इमामुल-अंबिया सरकार को रब ने बनाया है,

क़यामत तक नहीं मुमकिन कि अब कोई नबी आए।


लिखूँ हम्द-ए-ख़ुदा या नात मैं सरकार की लिख्खूँ,

फ़रिश्ते पढ़ के झूमें ऐसी, मुझको शायरी आए।


नज़र के सामने जब जल्वा-ए-सरकार-ए-अक़दस हो,

'रज़ा' फिर मौत भी आए तो वो हँसकर चली आए।


 NAATE RASOOL BY SALEEM RAZA REWA

 -9424336644


میرے بے جان ہونٹوں پر اگر نعتِ نبی آئے،

معطّر ہوں میری سانسیں، رگوں میں زندگی آئے۔


خدا کی رحمتیں برسیں، کرم کی روشنی آئے،

گھروں میں جشنِ آقا ہو، تو ہر گھر میں خوشی آئے۔


دلوں میں نور بھر جائے، گناہوں میں کمی آئے،

نبی کے ذکر سے افکار میں پاکیزگی آئے۔


اُٹھے جب بھی قلم میرا، نبی کی نعت لکھنے کو،

میرے لفظوں سے خوشبو جنت الفردوس کی آئے۔


نہ جانے کب مرے دل کی دعا سرکار تک پہنچے،

نہ جانے کب مقدر میں مدینے کی گلی آئے۔


اگر خاکِ مدینہ اپنی پلکوں سے لگا لوں تو،

مری بے نور آنکھوں میں نئی اِک روشنی آئے۔


امام الانبیا سرکار کو رب نے بنایا ہے،

قیامت تک نہیں ممکن کہ اب کوئی نبی آئے۔


لکھوں حمدِ خدا یا نعت میں سرکار کی لکھوں،

فرشتے پڑھ کے جھومیں ایسی، مجھ کو شاعری آئے۔


نظر کے سامنے جب جلوۂ سرکارِ اقدس ہو،

’رضا‘ پھر موت بھی آئے تو وہ ہنس کر چلی آئے۔


سلیم رضا ریوا

    24/10/2026 All india mushira haidarabad 


Saturday, August 1, 2026

ग़ज़ल क्या है : एक इब्तिदाई त'आरुफ़, BATEN GAZAL KI

   ---- Gazal Kya hai ---

ग़ज़ल का दायरा बेहद वसीअ (विस्तृत) और गहरा है। इस फ़न में जितना आगे बढ़ते जाइए, उतना ही एहसास होता है कि अभी बहुत कुछ जानना और सीखना बाक़ी है। यही ग़ज़ल की सबसे बड़ी ख़ूबी है कि हर नया मरहला इंसान के सामने इल्म, फ़िक्र और फ़न के नए दरवाज़े खोल देता है।


अगर यह पूछा जाए कि “ग़ज़ल क्या है?”, तो यक़ीनन इस मौज़ू पर एक नहीं, बल्कि अनेक किताबें लिखी जा सकती हैं। सदियों से अहल-ए-अदब, उस्तादान-ए-सुख़न और नक्क़ादीन-ए-अदब अपने-अपने अंदाज़ में इसकी तशरीह करते आए हैं।


मेरी कोशिश रहेगी कि इस वसीअ और पुरलुत्फ़ मौज़ू को आसान, मुख़्तसर और दिलनशीं अंदाज़ में आपके सामने पेश करूँ, ताकि हम सब मिलकर ग़ज़ल के फ़न, उसकी बारीकियों, उसकी रवायत और उसके हुस्न को बेहतर ढंग से समझ सकें।


आइए, आज से इस ख़ूबसूरत सफ़र की शुरुआत करते हैं।


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लफ़्ज़ “ग़ज़ल” की अस्ल


“ग़ज़ल” अरबी ज़बान का लफ़्ज़ है। इसके एक म'आनी महबूब से बातचीत करना बताए जाते हैं। एक दूसरी मशहूर रिवायत के मुताबिक़ “ग़ज़ल” उस घायल हिरन की दर्दभरी पुकार का नाम है, जो शिकारी के तीर से ज़ख़्मी होकर अपने दर्द का इज़हार करता है।


शायद यही वजह है कि ग़ज़ल में मोहब्बत, हिज्र, विसाल, इंतज़ार, दर्द, तन्हाई और इंसानी जज़्बात की सबसे गहरी तर्जुमानी मिलती है।


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ग़ज़ल का आग़ाज़


ग़ज़ल की इब्तिदा सातवीं सदी में अरब से मानी जाती है। इसकी बुनियाद अरबी ज़बान में पड़ी, जहाँ यह पहले क़सीदे के शुरुआती हिस्से “नसीब” के रूप में मौजूद थी। नसीब में महबूब की याद, जुदाई का दर्द और मोहब्बत के जज़्बात का बयान किया जाता था। धीरे-धीरे यही हिस्सा एक मुकम्मल और मुस्तक़िल सिन्फ़-ए-सुख़न की शक्ल में सामने आया, जिसे “ग़ज़ल” कहा गया।


अरबी ग़ज़ल के शुरुआती और सबसे प्रभावशाली शायरों में उमर इब्न अबी रबीआ का नाम लिया जाता है, जिन्होंने ग़ज़ल को एक स्वतंत्र साहित्यिक विधा के रूप में पहचान दिलाई।


इसके बाद ग़ज़ल फ़ारसी में पहुँची। वहाँ रूदकी, सनाई, निज़ामी, शेख़ सादी शीराज़ी, हाफ़िज़ शीराज़ी और मौलाना जलालुद्दीन रूमी जैसे महान शायरों ने इसे नई बुलंदियाँ अता कीं। फ़ारसी ग़ज़ल में इश्क़ के साथ-साथ तसव्वुफ़, रूहानियत और इंसानी फ़िक्र को भी ख़ास अहमियत मिली।


बारहवीं–तेरहवीं सदी में ग़ज़ल फ़ारसी के रास्ते हिंदुस्तान पहुँची। दिल्ली सल्तनत और सूफ़िया-ए-किराम की सरपरस्ती में इसे नई ज़मीन मिली। हज़रत अमीर ख़ुसरो ने फ़ारसी और हिंदवी के संगम से इस फ़न को नई दिशा दी और भारतीय तहज़ीब से इसे गहरा रिश्ता प्रदान किया।


इसके बाद सत्रहवीं सदी में वली मोहम्मद वली ‘वली दकनी’ ने उर्दू ग़ज़ल को बाक़ायदा नई पहचान दी। उन्हें “बानी-ए-उर्दू ग़ज़ल” और “बाबा-ए-रेख़्ता” कहा जाता है। उन्होंने ग़ज़ल को दरबारों से निकालकर आम लोगों की ज़बान और दिलों तक पहुँचाया।


 Nest-  Chapter  No -02

भाग (2)

उर्दू ग़ज़ल का सुनहरा दौर  ....

वली दकनी के बाद उर्दू ग़ज़ल ने तरक़्क़ी की ऐसी मंज़िलें तय कीं कि यह उर्दू अदब की सबसे मक़बूल सिन्फ़ बन गई।


मीर तकी मीर ने ग़ज़ल को दर्द, सादगी और इंसानी एहसास की गहराई दी। इसी वजह से उन्हें “ख़ुदा-ए-सुख़न” कहा गया।


मिर्ज़ा ग़ालिब ने ग़ज़ल में फ़लसफ़ा, तखय्युल और फ़िक्र के नए आयाम पैदा किए। मीरज़ा रफ़ी सौदा, मोमिन ख़ाँ मोमिन, शेख़ इब्राहीम ज़ौक़, दाग़ देहलवी और अल्लामा इक़बाल ने भी इस फ़न को अपनी बुलंद शायरी से समृद्ध किया।


आधुनिक दौर में फ़िराक़ गोरखपुरी, जिगर मुरादाबादी, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, नासिर काज़मी, अहमद फ़राज़, बशीर बद्र, निदा फ़ाज़ली, वसीम बरेलवी और राहत इंदौरी जैसे शायरों ने ग़ज़ल को नए एहसास, नई सोच और नए तेवर अता किए।


आज ग़ज़ल सिर्फ़ हिंदुस्तान और पाकिस्तान तक महदूद नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में उर्दू अदब की सबसे ज़्यादा पढ़ी और पसंद की जाने वाली सिन्फ़-ए-सुख़न है।


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ग़ज़ल की तारीफ़


ग़ज़ल अश'आर का ऐसा ख़ूबसूरत गुलदस्ता है, जिसमें हर शे'र अपने आप में मुकम्मल होता है। हर शेर एक अलग ख़याल, अलग एहसास और अलग कैफ़ियत का हामिल होता है, लेकिन पूरी ग़ज़ल एक ही बहर, क़ाफ़िया और रदीफ़ के ज़रिए एक ख़ूबसूरत तस्लीस (एकता) में बंधी रहती है।


आम तौर पर ग़ज़ल में कम-से-कम पाँच अश'आर होते हैं, जबकि इसकी कोई निश्चित अधिकतम सीमा नहीं है।

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ग़ज़ल महज़ शा'यरी का नाम नहीं, बल्कि तहज़ीब, जज़्बात, फ़िक्र, रूहानियत और इंसानी तजरिबात का आईना है। यही वजह है कि सदियों का सफ़र तय करने के बाद भी इसकी ताज़गी और दिलकशी में कोई कमी नहीं आई।


आने वाली कड़ियों में हम ग़ज़ल के बुनियादी अनासिर—शेर, मिसरा, मतला, मक़्ता, बहर, वज़्न, रदीफ़, क़ाफ़िया, तख़ल्लुस और इल्म-ए-अरूज़—पर तफ़सील से बातचीत करेंगे।

Friday, August 22, 2025

मेरे अपने कर रहे हैं, साथ मेरे छल बहुत salim raza reaa


मेरे  अपने  कर  रहे  हैं  साथ  मेरे  छल  बहुत

ये घुटन अब खाए जाती है मुझे हर पल बहुत



मुझको लगता था मुहब्बत का सफ़र आसाँ मगर

‘इश्क़ की  राहों  में  हैं  काँटों  भरे  जंगल  बहुत 


सादगी  ज़ेवर  है  उसका  और शरारत पैरहन

भोली-भाली उसकी सूरत है मगर चंचल बहुत


जिसके लहजे पर मुहब्बत की चढ़ी थी चाशनी

उसकी बातों ने किया जज़्बात को घायल बहुत


आज भी  उसकी  अदाओं  में वही हैं शोख़ियाँ

आज भी तकते हैं उसका, रास्ता पागल बहुत


अब मेरी तन्हाई भी हँसने लगी मुझ पर ‘रज़ा’

मेरी आदत ने किया है ज़ेहन को घायल बहुत

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میرے اپنے کر رہے ہیں، ساتھ میرے چل بہت

یہ گھٹن اب کھائے جاتی ہے مجھے ہر پل بہت

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بج رہی ہے کانوں میں اب تک تیری پائل بہت

تیری یادیں کر رہی ہیں ذہن میں حلچل بہت

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مج   کو  لگتا  تھا  محبت  کا  سفر  آساں  مگر

عشق کی راہوں میں ہیں کانٹوں بھرے جنگل بہت

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سادگی زیور ہے اس کا، اور شرارت پیرہن

بھولی بھالی اس کی صورت، ہے مگر چنچل بہت

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جس کے لہجے پر محبت کی چڑھی تھی چاشنی

اس کی باتوں نے کیا جذبات کو گھائل بہت

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آج بھی اس کی اداؤں میں وہی ہیں شوخیاں

آج بھی تکتے ہیںاسکا راستہ ے پاگل بہت

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اب میری تنہائی بھی ہنسنے لگی مجھ پر “رضا”

میری عادت نے کیا ہے ذہن کو گھائل بہت


———— 2122–2122–2122–212———— 

ग़ज़ल की बह्र है:

रमल मुसम्मन महज़ूफ़

फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाइलुन

——salim raza rewa - سلیم رضا ریو ——


बयाँ मैं कैसे करूँ अपनी ज़िंदगी की थकन

  बयाँ मैं कैसे करूँ अपनी ज़िंदगी की थकन तमाम रात सताती है बेबसी की थकन सरों पे बोझ है हर वक़्त ज़िम्मेदारी का सो जीते-जी नहीं जाएगी आदमी की...