बयाँ मैं कैसे करूँ अपनी ज़िंदगी की थकन
तमाम रात सताती है बेबसी की थकन
सरों पे बोझ है हर वक़्त ज़िम्मेदारी का
सो जीते-जी नहीं जाएगी आदमी की थकन
तमाम दिन की मशक़्क़त से टूटता हूँ जब
बड़े सुकूँ से सुलाती है चाकरी की थकन
उड़ा के ले गई है मौत हर परेशानी
''नहीं है रुख़ पे पस-ए-मर्ग ज़िंदगी की थकन''
निगाह-ए-यार ने क्या घोल कर पिलाया था
तमाम उम्र न उतरी ये आशिक़ी की थकन
उतार देता हूँ जब अपने दर्द-ओ-ग़म का लिबास
गले लगा के सुलाती है मुफ़्लिसी की थकन
नक़ाब चेहरे पे ख़ुशियों का डाल कर अपने
छुपा रहा है ‘रज़ा’ अपनी बेबसी की थकन
------Gazal by Saleem raza --------
ग़ज़ल की बह्र
मुज्तस मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़
मुफ़ाइलुन फ़इलातुन मुफ़ाइलुन फ़इलुन
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