Wednesday, July 16, 2025

इब्तिदा-ए-सफ़र-ए-सुख़न

इब्तिदा-ए-सफ़र-ए-सुख़न (सलीम रज़ा रीवा)

इस बंदा-ए-हक़ीर ने अपने सफ़र-ए-सुख़न का आग़ाज़ सन 1993 में किया। उस वक़्त मेरी तहरीरी कोशिशें गीतों की पैरोडी तक महदूद थीं — न ग़ज़ल का श’ऊर था, न ‘इल्म-ए-‘अरूज़ से कोई वाक़फ़ियत। मगर रब-ए-करीम की रहमत से दिल में ख़यालात की दौलत उतरती रही, और वो ख़याल लफ़्ज़ों का जामा पहनकर काग़ज़ पर उतरने लगे।


सन 1995 में गोरैया (ज़िला सतना) की एक नातिया महफ़िल में शिरकत का मौक़ा’ मिला।

महफ़िल की रूहानी फ़ज़ा से दिल भर आया, आँखें अश्क़बार हो गईं, और रूह ने सज्दे में झुककर रब से ये दु’आ माँगी:


या अल्लाहमुझे सलीक़े से हम्दना’त और ग़ज़ल

 कहने की तौफ़ीक़ ‘अता फ़रमा।


उस पाक लम्हे से जो सिलसिला शुरू हुआ, वो आज तक दिल और क़लम के दरमियान एक पाकीज़ा रिश्ता बना हुआ है।


उस दौर में मैं अक्सर क़लम और कापी तकिए के नीचे रखकर सोता था — कि अगर नींद में कोई शे’र ‘अता हो, तो फ़ौरन उसे दर्ज कर सकूँ।

शायद उसी यक़ीन ने मुझे ये समझा दिया कि:


“वो जिसे चाहे ‘अता कर दे ज़माने की ख़ुशी,

उसके ही क़ब्ज़े में है सारे जहाँ की नेमत”


इस वक़्त मैं मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी (मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद्) के ज़िला रीवा का समन्वयक (कोऑर्डिनेटर) हूँ और उर्दू ज़बान की तर्वीजो  इशाअत(प्रचार-प्रसार) में मसरूफ़ हूँ।

मैं मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी, संस्कृति परिषद और ख़ास तौर पर उर्दू अकादमी की निदेशक  मोहतरमा डॉ. नुसरत मेहदी साहिबा का दिल की गहराइयों से शुक्रगुज़ार हूँ कि उन्होंने इस नाचीज़ को पिछले तीन वर्षों यानी 2022 से ज़िले की ज़िम्मेदारी सौंप कर उर्दू अदब की ख़िदमत का मौक़ा’ फ़राहम किया।”


मेरी हमसफ़र ज़ैनब रज़ा की आवाज़ 


12 मई 1992 — वो तारीख़ जब मैंने उन्हें अपना हमसफ़र माना।

मुझे क्या मा’लूम था कि मैं महज़ एक शख़्स की नहीं,

बल्कि एक ऐसे शा’इर की ज़िंदगी में दाख़िल हो रही हूँ,

जिनकी हर साँस में शा’इरी है ।


सलीम ‘रज़ा’ — वो नाम नहीं, एहसास है।

वो जब क़लम उठाते हैं, तो जैसे दिल की तहों से लहू बहने लगता है।

उनके लिए शा’इरी कोई हुनर नहीं — इबादत है।

हर शे’र में ज़िंदगी की कोई तल्ख़ या मीठी,

मगर बेहतरीन और सच्ची हक़ीक़त झलकती है —

ऐसे जैसे ज़ख़्म को फूल की तरह पेश कर रहे हों।


मैंने कभी अदब को पढ़ा नहीं था,

मगर उनकी शा’इरी ने मुझे अदब की आँखें दे दीं।

मैंने कभी शे’र नहीं कहे,

मगर उनकी हर ग़ज़ल में मेरी मौजूदगी मिलती है —

कभी तस्लीम की ख़ामोशी में,

कभी एक अनकही दु’आ के लहजे में।


जब वो कोई नया शे’र कहते,

तो सबसे पहले मेरी आँखों में झाँकते —

एक मासूम सवाल लिए — कैसा है?”

और मैं सिर्फ़ मुस्कुरा कर कहती —

“बेहद ख़ूबसूरत है…”

शायद मेरी यही मुस्कान

उनके क़लम की सबसे बड़ी ताक़त बनती गई।


‘रज़ा’ शौहर होने के साथ-साथ मेरी दु’आओं का मुकम्मल सिला हैं।

जब वो शा’इरी करते हैं,

तो यूँ लगता है जैसे मेरा ‘इश्क़ अल्फ़ाज़ की शक्ल में सांस ले रहा हो।


मैं हर पल दुआ करती हूँ —

कि उनका हर शे’र किसी टूटे हुए दिल का मरहम बने,


— ज़ैनब रज़ा


✅जनाब रफ़ीक़ रिवानी साहब की रहनुमाई

मेरा अदबी सफ़र तक़रीबन सन 2005 में एक अहम मोड़ पर पहुँचा, जब मेरी मुलाक़ात जनाब रफ़ीक़ रिवानी साहब से हुई — और मैंने उन्हें अपना उस्ताद बना लिया। उस वक़्त शा’इरी महज़ एक शौक़ था, जिसे सँवारने के लिए मैं अपने टूटी-फूटी ग़ज़लें लेकर , अक्सर 20 किलोमीटर दूर से उनके स्कूल पहुँच जाया करता था।

रफ़ीक़ साहब मेरे अश’आर की इस्लाह करते ।

उन्हीं की रहनुमाई का असर था कि मैंने पहली बार मुशा’एरों और अदबी नशिस्तों का हिस्सा बनना शुरू किया — जहाँ सुनने वालों ने मेरी आवाज़, मेरी शा’इरी, और मेरे तरन्नुम को सराहा।

अल्लाह तआला ने मुझे जो तरन्नुम की ने’मत ‘अता की है, वो भी इसी दौर में निखर कर सामने आई। मेरी आवाज़ को सुनकर अहले-ज़ौक़ की दाद और हौसला-अफ़ज़ाई ने मेरी रूह को ताक़त दी।

दु’आ है कि रफ़ीक़ साहब हमेशा सेहतमंद, ख़ुशहाल और अदबी रौनक़ों से सरशार रहें।


जनाब तहूर मंसूरी ‘निगाह’ साहब 


सन 2015 में रुबाई के मुमताज़ शा’इर जनाब तहूर मंसूरी ‘निगाह’ साहब से मुलाक़ात का शरफ़ हासिल हुआ।

वो न सिर्फ़ एक आला दर्जे के शा’इर हैं, बल्कि इंसानियत का भी बेहतरीन आइना हैं। पहली ही मुलाक़ात में उन्होंने इस नाचीज़ को मोहब्बत और अपनेपन से नवाज़ा। वक़्त-बेवक़्त वो ग़ज़लों और अफ़सानों की किताबें ‘इनायत 

फ़रमाते रहे — और आज भी उनकी मोहब्बत इस अदना शख़्स की सरपरस्ती कर रही है।

अक्सर उनसे अदब पर दिलनशीं गुफ़्तगू होती रहती है।

उनका ज़िक्र करना इसलिए भी लाज़िमी है कि वो हमेशा मेरे लिए फ़िक्र मंद रहे। अक्सर वो फ़ोन से हाल-चाल पूछते रहते हैं,— यह सब एक बुज़ुर्ग शा’इर का वो करम है जिसे मैं उम्र भर नहीं भूल सकता।

अल्लाह-रब्बुल-इज़्ज़त से दु’आ है कि जनाब ‘निगाह’ साहब को दराज़ उम्र और सेहत से लबरेज़ ज़िंदगी ‘अता फ़रमाए।

उनका फ़न, उनकी फ़िक्र और उनकी फ़ित्रत, हमेशा यूँ ही अदब पर मेहरबान रहे — आमीन।



✅:-जनाब जाम रिवानी 


जनाब जाम रिवानी साहब न सिर्फ़ एक बेहतरीन शा’इर

 हैं, बल्कि एक बेहद शफ़ीक़ और ख़ुलूस से भरे इंसान भी हैं।


हमारी पहली मुलाक़ात के बाद उनकी दुकान पर बैठने का सिलसिला शुरू हुआ, और देखते ही देखते एक दोस्ताना रिश्ता क़ायम हो गया। वो मुझसे बेपनाह मोहब्बत फ़रमाते — जब भी कोई नई ग़ज़ल कहता, सबसे पहले उन्हें ही सुनाता। वो हर बार बड़ी मोहब्बत से सुनते, और उन पर दिल खोलकर गुफ़्तगू होती ।

वो मुझे हमेशा अपनी मुहब्बत से माला-माल और रहनुमाई से सरफ़राज़ करते ।


जाम रिवानी साहब की दुकान, शा’इरी के शौक़ीनों का एक अदबी मरकज़ है ।

वहाँ अक्सर जनाब हसमत रिवानी साहब, मरहूम अमीन रिवानी साहब, जनाब साहिर रिवानी, जनाब एडवोकेट रवि प्रकाश गुप्ता और जनाब नागेन्द्र मणि जैसे फन के दीवाने तशरीफ़ लाते और अदब की महफ़िल जम जाती।

वो ठिकाना महज़ एक दुकान नहीं थी , बल्कि शायरी की रूह से लिपटी हुई एक महफ़िल थी — जहाँ हर लफ़्ज़, हर मिसरा दिल से निकलकर दिल तक पहुँचता था।

अल्लाह तआला उन्हें दराज़ उम्र और सेहत-ओ-तंदुरुस्ती ‘अता फ़रमाए


जनाब सुभाष श्रीवास्तव साहब 


कवि, लेखक, पत्रकार, मीसाबंदी और समाजसेवी — जनाब सुभाष श्रीवास्तव साहब।

अदब की दुनिया में उनका पूरा घराना एक मक़बूल नाम रहा है। उनके साहबज़ादे,  जनाब साकेत श्रीवास्तव और जनाब सिद्धार्थ श्रीवास्तव (बट्टू) साहब भी इस रिवायत को 

ख़ूबसूरती से आगे बढ़ा रहे हैं।


मुझ को सुभाष भाई साहब ने अपने मंचों पर बारहा इज़्ज़त से नवाज़ा। उन्हीं की बदौलत रीवा और आसपास के शा’इरों को एक सलीक़ामंद मंच मयस्सर हुआ , जहाँ आला अफ़सरान और सियासतदान भी शा’इरी के क़द्रदान बनकर तशरीफ़ लाते थे।


“आज भी उनकी मोहब्बत और अपनेपन का आलम यह है कि ई’द के दिन — हालात जैसे भी हों, और रात का कोई 

भी पहर क्यों न हो — वो जनाब सिद्धार्थ श्रीवास्तव (बट्टू) साहबज़ादे के साथ हमारे घर तशरीफ़ लाते हैं।

अपने दस्त-ए-मुबारक से सिवैयाँ चखते हैं, और अपनी दिली दु’आओं और बेपनाह मोहब्बत से नवाज़ कर रुख़्सत होते हैं।

यह उनकी रवादारी, इख़लास और मेरे घराने से जुड़ाव की वो मिसाल है, जो दिल को हमेशा रौशन किए रखती है।”


अल्लाह तआला उन्हें दराज़ उम्र और सेहत और तंदुरुस्ती ‘अता फ़रमाए, और ये सिलसिला यूँ ही चलता रहे।

दु’आ है कि वो और उनके फ़रज़ंद अदब व साहित्य की ख़िदमत इसी शौक़, सलीक़े और ख़ुलूस के साथ करते रहें। आमीन।


 जनाब क़मर साक़ी साहब :-


2018 में मेरी पोस्टिंग धार हुई, और वहीं मेरी मुलाक़ात धार के  शो’अरा से हुई।

जनाब क़मर साक़ीअसरार धारवीसलाम कादरी मोईन साहब, से रु-ब-रु होना मेरे अदबी सफ़र का एक अहम मरहला रहा।


जनाब क़मर साक़ी साहब — एक रोशन फ़िक्र और जदीद एहसास का नाम


जदीद उर्दू शा’इरी के आबदार चेहरों में एक नाम जो ख़ासतौर पर तवज्जोह का हक़दार है — जनाब क़मर साक़ी साहब — जिनकी शा’इरी न सिर्फ़ नए 

लबो-लहजे की नुमाइंदगी करती है, बल्कि उनके तसव्वुरात और तख़य्युल की गहराई जदीद शा’इरी को एक नया रुख़ ‘अता करती है।


मुझे ये सआदत हासिल हुई कि उनसे जदीद शा’इरी पर 

संजीदा गुफ़्तगू करने का मौक़ा मिला। इस मुलाक़ात ने मेरी सोच के दरवाज़े खोले और जदीदियत की ज़बान, उसकी फ़िक्र और फन की बारीकियों से मुझे आशना किया।


उनकी सोहबत और रहनुमाई ने मुझे शा’इरी को महज़ एहसास या इज़हार का ज़रिया समझने से आगे ले जाकर, उसे एक फिक्र, एक ज़िम्मेदारी, और एक नर्म लेकिन असरदार इंक़़लाब के तौर पर देखने वाली नज़र बख़्शी।


मैं दिल की गहराइयों से उनका शुक्रगुज़ार हूँ कि उन्होंने मेरी सोच को नई परवाज़ दी और क़लम को एक नया मक़सद।


दु’आ है कि अल्लाह तआला जनाब क़मर साक़ी साहब को तंदरुस्ती, लंबी उम्र और फ़िक्र-ओ-फन की बुलंदियों से नवाज़े।


असरार धारवी साहब न सिर्फ़ बेहतरीन शा’इर हैं, बल्कि दोस्त और बड़े भाई की तरह हमेशा रहनुमाई करते रहे।


सलाम कादरी साहब, जो मशहूर क़व्वाल हैं (शाहिद सलाम साबरी के नाम से), उन्होंने मेरी नज़्म को भी 

यू-ट्यूब पर पेश किया। उनकी मुहब्बत हमेशा बड़ी भाई की मुहब्बत जैसी रही।


आज़म ख़ान साहब, जो धार के ही एक और क़व्वाल हैं, उन सबकी मोहब्बतें आज भी दिल में महफ़ूज़ हैं।


 इंदौर के अदबी सफ़र में भी कुछ नाम ऐसे हैं जिन्होंने अपनी मोहब्बतों से मुझे हमेशा लबरेज़ रखा।

उस्ताद जनाब रशीद शादानी साहब, जनाब आरज़ू अश्क़ी साहब, जनाब फ़रियाद बहादुर साहब, जनाब गौहर देवासी  साहब, जनाब अखिल ‘राज़’ साहब और जनाब मुस्ताक अंसारी साहब —सभी का तह-ए-दिल से शुक्रिया.


 कुछ और अज़ीज़ और मोतबर नाम -:

 जिन्होंने अपनी मोहब्बतों से नवाज़ा और अदबी सफ़र में दुआओं की बारिश की।

जनाब डा. आज़म ख़ान साहब (भोपाल), संगीतकार जनाब याक़ूब ख़ान साहब ( रीवा ) जनाब हसन फतेपुरी साहब (नोएडा), जनाब समर कबीर साहब (देवास), और जनाब तस्दीक़ ख़ान साहब (अजमेर) — ये तमाम 

अहले-दिल और अहले-सुख़न शख़्सियतें मेरे लिए सिर्फ़ रहनुमा ही नहीं, बल्कि दु’आओं  का दरिया हैं।


✅ ‘इल्म-ए-‘अरूज़ और मेरा सफ़र 


अदब से मेरी मुहब्बत कोई सतही दिलचस्पी नहीं थी — ये मेरी रूह की पुकार थी, मेरी तन्हाईयों का उजाला और मेरी सोच की परवाज़। जब दिल ने चाहा कि सिर्फ़ शे’र कहना काफ़ी नहीं, शा’इरी की तह में उतरना भी ज़रूरी है, तब मैंने फ़न-ए-शा’इरी की बारीकियों को जानने का इरादा कर लिया।

       ‘इल्म-ए-‘अरूज़ का फ़न मुझे न तो किसी उस्ताद की सुहबत से नसीब हुआ,

न ही इस पर किसी सरपरस्त की रहनुमाई मयस्सर हुई ।


मैंने किताबों के ज़रिए, मोबाइल ऐप्स, ऑडियो-वीडियो लेक्चर्स और डिजिटल ज़रियों से ‘इल्म-ए-‘अरूज़ को सीखना शुरू किया। रास्ता आसान नहीं था, मगर मेरी लगन ने हर मुश्किल को आसान बना दिया।


इस सफ़र में डॉ. आज़म साहब की किताब

‘’आसान ‘अरूज़’’ मेरे लिए नूर का चराग़ साबित हुई। इस किताब ने बह्रों, वज़्नों, अरकान और उनकी तश्कील को समझने में मेरी बेपनाह मदद की। जब भी किसी मस'अले पर मेरी समझ कम पड़ी, डॉ. आज़म साहब ने न सिर्फ़ रहनुमाई फ़रमाई, बल्कि हर बार बेहद मोहब्बत और ‘इनायत से मेरी मदद की।”


मैंने ख़ुद को हर दिन सिखाया — मिसरों को तौला, बह्रों को परखा, और हर शे’र के पीछे छुपे वज़्न को महसूस किया।

शा’इरी अब महज़ एहसास नहीं रही — ये ‘इल्म और अदब की ज़बान बन गई।


इस सफ़र में मेरा सबसे बड़ा सहारा मेरा रब बना, जिसने मेरे दिल में शौक़ भी पैदा किया और सीखने की सलाहियत भी।


✅उस्ताद असलम माजिद जबलपुरी साहब का दर्स और मेरे फ़ने-ग़ज़ल की तकमील


हर शा’इर के दिल में यह तमन्ना ज़रूर होती है कि कोई ऐसा उस्ताद मिले जो महज़ शा’इर ही नहीं, बल्कि एक कामिल इस्लाहकार भी हो — जो शागिर्द की ता’लीम को अपना मिशन बना ले।

मुझे भी एक ऐसे रहनुमा की तलाश थी, और 

अल्हम्दु लिल्लाह, यह तलाश 2024 में पूरी हुई, जब मेरा तबादला जबलपुर हुआ।


उसी दौरान मेरी मुलाक़ात उस्ताद--मोहतरम जनाब

असलम माजिद जबलपुरी साहब से हुई — जो न सिर्फ़ एक मक़बूल और आला दर्जे के शा’इर ही नहीं बल्कि एक संजीदा इस्लाहकार और उस्तादुल असातिज़ा मरहूम मुह़म्मद असग़र "शबनम" ग़ज़नफ़री जबलपुरी के वफ़ादार शागिर्द भी हैं। जिनके शागिर्दों की तादाद तक़रीबन तीस से ज़ियादा है।


मैं उन्हें पहले से जानता था — टेलीफ़ोन पर बात होती रही थी — मगर रू-ब-रू मुलाक़ात के बाद जो रूहानी तासीर उनकी सुहबत से मिली, उसने मेरी शा’इराना सोच को जैसे एक नया रुख़ दे दिया।

मैं उनके ‘इल्म और फ़न से इस क़दर मुतास्सिर हुआ कि उनसे अर्ज़ कर दिया:


“उस्ताद, मुझे अपनी शागिर्दी में ले लीजिए।”


उन्होंने कुछ शर्तों के साथ मेरी दरख़्वास्त क़ुबूल की, और यूँ मेरे अदबी सफ़र का एक नया और पाक़ बाब खुला।


उनकी इस्लाही निगाह का असर यह हुआ कि मुझे एहसास हुआ कि — माज़ी में जो लोग रहनुमा बने, उन्होंने मेरी ग़लतियों की तरफ़ मुकम्मल ध्यान नहीं दिया था। मगर उस्ताद असलम माजिद साहब ने मेरी हर ग़ज़ल, हर मिसरे, हर लफ़्ज़ को गौर से देखा, और इस्लाह की — बह्रवज़्नरदीफ़काफ़ियाख़याल तलफ़्फ़ुज़, अनदाज़े बयान तक़रीबन— हर पहलू पर बारीकी से बात की।


पहले मेरी ग़ज़लें आमतौर पर पाँच-सात अश'आर तक महदूद रहती थीं। मगर उस्ताद ने फ़रमाया:


“ अश'आर की तादाद कम से कम दस होनी चाहिए।”


उसके बाद से मेरी आदत बन गई कि हर रोज़ 10–12 नए शे’र कहने की कोशिश करूँ और हर ग़ज़ल मुकम्मल हो।


हम हफ़्ते के पाँच दिन मिलते — दो-तीन घंटे की बैठकों में सिर्फ़ शे’रो-शा’इरी नहीं, बल्कि अरूज़, फ़िक्री पहलू और ग़ज़ल की बारीकियों पर मुकम्मल गुफ़्तगू होती।


वो सिर्फ़ उस्ताद नहीं रहे — उनसे एक मुहब्बत भरा रिश्ता भी बन गया , वो अपने हर सच्चे शागिर्द से अपने औलाद की तरह मुहब्बत रखते हैं,


मैं शुक्रगुज़ार हूँ उस अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त का, जिसने मेरी दु,आ क़ुबूल की और मुझे एक ऐसा उस्ताद ‘अता किया — जो ‘इल्म भी देता है, और अपनेपन का अहसास भी।


दु’आ है कि अल्लाह उन्हें सेहत, लंबी उम्र और अदब में बुलंदी अता फ़रमाए। उनका एहसान मेरी शा’इरी की पेशानी पर हमेशा चमकता रहेगा।

आमीन।

- “बज़्म-ए-शबनम-ओ-ग़ज़नफ़र”


जबलपुर की अदबी सरज़मीन पर  “बज़्म-ए-शबनम-ओ-ग़ज़नफ़र” एक नूरानी नाम है,

 जिसकी बुनियाद उस्तादुल असातिज़ा मुह़म्मद असग़र "शबनम" ग़ज़नफ़री जबलपुरी ने अपने उस्ताज़ ए मुहतरम रहमतुल्लाह "ग़ज़नफ़र" हमीदी साहब के नाम पर रखी थी

इसका नाम उन्होंने " बज़्म ए ग़ज़नफ़र" रखा था

शबनम साहब के इंतकाल के बा'द

 उस्ताज़-ए-मुहतरम जनाब असलम "माजिद" जबलपुरी साहब ने उसी बज़्म के नाम में अपने उस्ताज़ शबनम साहब का नाम जोड़ दिया और इसका नाम "बज़्म ए शबनम ओ ग़ज़नफ़र "  कर दिया, इस बज़्म का अदबी सिलसिला "मुहतरम इमाम बख़्श नासिख़ लखनवी से है! ये बज़्म शबनम साहब की जारी करदा रिवायात पर ज़िम्मेदारी से क़ाइम है। इस ख़ुशबू-ए-अदब से महकती बज़्म का मैं भी एक फ़र्द हूँ और यह मेरे लिए फ़ख़्र की बात है।


इस किताब के सफ़र में मुझे बज़्म के जिन अहबाब की मुहब्बत हासिल रही, उनका तहे-दिल से शुक्रिया अदा करना मैं अपना फ़र्ज़ समझता हूँ।


ख़ासकर मैं शुक्रगुज़ार हूँ इन मुहतरम शु'अरा का

जनाब "इज़हार" जबलपुरी साहब, जनाब शाहनवाज़ "महबर" साहब, जनाब रफ़ीक़ "दुरवेश" साहब, जनाब "शादाब" वारसी साहब

इन तमाम अहबाब की मुहब्बत, और ख़ुलूस ने इस किताब को मुकम्मल करने में एक अहम् किरदार अदा किया है। अल्लाह से दु'आ है कि इन सबको सेहत, कामयाबी और शुहरत-'अत़ा फ़रमाए। 

बज़्म के बाक़ी शु'अरा को भी कामयाबी और कामरानी की दु'आएं ।

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