Friday, July 18, 2025

B 111 SALIM RAZA REWA


 111

—————————-

                      उसकी बातें हुज़ूर क्या कहना
आसमाँ पर ग़ुरूर क्या कहना


जो था दिल के क़रीब मुद्दत से

है वो नज़रों से दूर क्या कहना


उस की ख़ुशबू है, सारी गलियों में

और वो बे-ज़ुहूर क्या कहना


हर तरफ़ उसकी वाह-वाही है

अब उसे बे-श’ऊर क्या कहना


अश्क़ आँखों में हैं , हँसी लब पर

उसपे चेहरे का नूर क्या कहना


धूम उनकी है सारे आलम में 

उनका इल्मों शऊर क्या कहना


सब का इल्ज़ाम ले लिया सर पर

है ‘रज़ा’ बेक़सूर क्या कहना


—-——2122/1212/22———

05/05/25

ग़ुरूर-घमंड,  मुद्दत-दीर्घ काल,  बे-ज़ुहूर-अदृश,  इल्मों-ज्ञान, शऊर- तरीक़ा,योग्यता,  


112

—————————————-


ग़ुरबत की क़ैद में भला क्या क्या नहीं किया 

लेकिन किसी भी शख़्स से चर्चा नहीं किया


हर वक़्त तेरी ख़ुशबू महकती है साँस में

मुझको तिरे ख़याल ने तन्हा नही किया


अपना बदन निचोड़ के पाई है हर ख़ुशी 

क़िस्मत पे अपनी हमने भरोसा नहीं किया 


इल्मों शऊर लाँघ न जाए हद-ए-ग़ुरूर

इस वास्ते कभी भी दिखावा नहीं किया


आया है जब से नाम तुम्‍हारा ज़ुबान पर 

होटों ने फिर किसी का भी चर्चा नहीं किया


ज़ुल्मों-सितम ज़माने के हँस-हँस के सह लिए

लेकिन कभी  वक़ार का सौदा नहीं किया


उम्मीद उस बशर से करें क्या वफ़ा की हम

जिसने किसी के साथ भी अच्छा नहीं किया


 अम्न-ओ-अमाँ से हमने गुज़ारी है ज़िंदगी

मज़हब के नाम पर ‘रज़ा’ झगड़ा नहीं किया


——221/2121/ 1221/212——-

आएगा मुश्किलों में भी जीने का फ़न तुझे

कुछ दिन गुज़ार ले तू मेरी बेबसी के साथ

——————

10/05/25

ग़ुरबत-ग़रीबी, तन्हा-अकेला, फ़रेब-धोका,छल,

वक़ार-इज़्ज़त, अम्न-ओ-अमाँ-शांति और सुरक्षा,


113

—————————————-


कितना बे-रंग ये ज़माना है 

आसमानों में घर बनाना है 


मैं ज़मीनों से उठ गया कब का

अब फ़लक मेरा आशियाना है


तेरी उल्फ़त की ओढ़ कर चादर 

सारी दुनिया से दूर जाना है 


कोई ख़्वाहिश नहीं, न कोई ग़म

अपना अंदाज़ सूफ़ियाना है


मुश्किलों से निबाह कर लूँगा

साथ तुझको मगर निभाना है


मुझको ख़्वाहिश है उससे मिलने की

उसके होंटों पे बस बहाना है


एक दिन ख़्वाब में ही आ जाओ

तुमको फिर से गले लगाना है 


ज़ख़्म-ए-उल्फ़त सँभालें क्यों न ‘रज़ा’

अपने जीने का ये बहाना है 

20/05/25

—————2122/1212/22—————— 


एक दिन ख़्वाब में वो क्या आए 

घर मेरा अब तलक महकता है

————-

फ़लक-आसमान, ख़्वाहिश- इच्छा,

ज़ख़्मे-उल्फ़त-प्यार के घाव, फ़क़त-सिर्फ़,

———————xxx——————-



114

—————————————-

तुझे किस बात का ग़म खा रहा है  

जो तेरा रंग उड़ता जा रहा है


ये सन्नाटा बहुत चिल्ला रहा है 

कोई तूफ़ान शायद आ रहा है


लरज़ते होंठ से उलझे इशारे

वो कुछ न कुछ मुझे समझा रहा है 


मुझे बदनाम करना ठीक है पर

तुम्हारा नाम भी तो आ रहा है


किसी के ख़्वाब पूरे हो रहे हैं

किसी का खूँ निचोड़ा जा रहा है


दर-ओ-दीवार क्यों सहमे हुए हैं

कोई हस्ती मिटाने आ रहा है


वही इक शख़्स जो बुनियाद में था

उसे बाहर निकाला जा रहा है


हमारे ख़्वाब छीने जा रहे हैं

हमें किश्तों में तोड़ा जा रहा है


तिरे जैसा हसीं महबूब पाकर 

दिल-ए-नादाँ बहुत इतरा रहा है


है उसकी आँखों में अश्क़-ए-नदामत 

ग़नीमत है  की वो पछता रहा है 


‘रज़ा’ हम भी नहीं हैं पहले जैसे

हमें ये आईना समझा रहा है


—————1222/1222/122—————— 


तेरी पेशानी पे होगा उजाला कामयाबी का

मगर तुझको सफ़र में भीड़ से आगे निकलना है

————

लरज़ते-काँपते, दिल-ए-नादाँ-पागल दिल, नदामत-पश्चाताप, ग़नीमत-संतोष करने योग्य बात,

25/05/25

115

—————————————-

तुम्हारे इल्म के धारों से रौशनी फैले 

कि जैसे चाँद सितारों से रौशनी फैले


क़दम-क़दम पे उजालों के शामियाने हों 

क़दम क़दम पे नज़ारों से रौशनी फैले


तिलावतें हों ज़मीं पर अदब के साए में

कलाम-ए-पाक के पारों से रौशनी फैले


दु’आ से दिल के अंधेरे पिघलने लग जाएँ 

ख़मोश लब के इशारों से रौशनी फैले


तेरे सुजूद से फूटे किरन इबादत की 

तेरी दु’आ के शरारों से रौशनी फैले


ख़ुदा करे तेरे लफ़्ज़ों में वो असर उतरे

कि तेरे इल्मी इदारों से रौशनी फैले


हरेक साँस इबादत में हो ‘रज़ा’ तेरी

इबादतों के इशारों से रौशनी फैले

—-1212/1122/1212/22——-

नज़ारों-दृश्य, तिलावतें-कुरान का पढ़ना, 

 सुजूद-सजदा, इदारों-संस्थानों, 

30/05/25


116

—————————————-

ज़हर आलूद हैं हवाएँ अब  

इसलिए फैली हैं वबाएँ अब 


हम फ़क़त तालियाँ बजाएँ अब

या ज़मीरों को भी जगाएँ अब


ज़ुल्म जब कर रहे हैं ख़ुद मुंसिफ़

कैसे इंसाफ़ को बचाएँ अब 


रौंद कर वो मेरे ख़्यालों को

जीत का ज़श्न भी मनाएँ अब


हर तरफ़ तीरगी का क़ब्ज़ा है

किस तरह रौशनी को लाएँ अब


ज़ख़्म सीने के मुस्कुराते हैं

हम कहाँ तक इन्हें छुपाएँ अब


कितनी गुमसुम “रज़ा” फ़ज़ाएँ हैं 

इक पुरानी ग़ज़ल सुनाएँ अब

———2122/1212/22——-

05/06/25

आलूद, संक्रमित, दूषित, वबाएँ-बीमारियाँ, महामारियाँ, ज़मीर-अंतरात्मा, ज़ुल्म-अत्याचार, अन्याय, मुंसिफ़-न्याय करनेवाला, तीरगी-अँधेरा, फ़ज़ाएँ-बातावरण, माहौल

—————


117

—————————————-

अगर वो चाहे घटाओं से रौशनी फैले

अँधेरा चमके हवाओं से रौशनी फैले


जहाँ भी तेरी इनायत की बारिशें हो जाएँ

वहाँ करम की फ़ज़ाओं से रौशनी फैले


हमारे हाथ की तहरीर में उजाला हो

क़लम से निकली सदा‌ओं से रौशनी फैले


अगर सलीक़ा पता हो दुआएँ करने का

तो फिर हमारी दुआओं से रौशनी फैले


जो सर्द रातें बदन नोचने लगें फिर तो

कटी-फटी ही रिदाओं से रौशनी फैले


तुम्हारा नाम लिया जाए जिस सुकून के साथ 

उसी ख़मोश सदाओं से रौशनी फैले


रज़ा’ वफ़ा जो यहाँ फ़ितरतों में घुल जाए

तो हर सदी में वफ़ाओं से रौशनी फैले


——-12121/1221/212/22———

घटाओं- बादलों, फ़ज़ा, बहार,वातावरण, तहरीर- लिखाई, लिखावट, सदा-आवाज़, सलीक़ा-ढंग, तरीक़ा, रिदाओं-चादरों,

15/06/25


118

—————————————-

ये मुश्किल काम करना चाहता हूँ 

तेरे दिल में उतरना चाहता हूँ


तेरे ख़्वाबों की चादर ओढ़ कर मैं 

ज़रा आराम करना चाहता हूँ


मुझे आदत ने आवारा किया है

तेरे ख़ातिर सुधरना चाहता हूँ


मेरी आँखों में भी ख़ौफ़-ए-ख़ुदा हो 

गुनाहों से मैं डरना चाहता हूँ


बनाकर दिल में एक तस्वीर तेरी

मैं उस में रंग भरना चाहता हूँ


चराग़-ए-आरज़ू दिल में जलाकर 

अँधेरों से गुज़रना चाहता हूँ


बिखर कर रह गया हूँ मैं तेरे बिन

तेरे हाथों सँवरना चाहता हूँ 


‘रज़ा’ मैं थक गया दुनिया से लड़कर

मैं कुछ लम्हें ठहरना चाहता हूँ

20/06/25

-—-1222❗️1222❗️122 —-


119

—————————————-

हमारी सिम्त से तो प्यार का पैग़ाम चलता है 

तुम्हारे ज़ेहन में अब तक ख़याल-ए-ख़ाम चलता है


वफ़ा 'इल्मो-हुनर, शे'रो-अदब सब रहते हैं पीछे

यहाँ ताक़त है जिसके पास, उसका नाम चलता है


ख़्याले यार ने इस ज़ेह्न को रौशन बना डाला

अब इसकी रौशनी में मेरा सारा काम चलता है 


मोहब्बत हो गई जब से शराब-ए-इश्क़ पीता हूँ 

तसव्वुर में निगाह-ए-यार का ही जाम चलता है 


तेरी यादों की जब भी रेलगाड़ी दिल में चलती है

तो मेरे ज़ेहन की पटरी पे तेरा नाम चलता है


तख़य्युल की हदों से भी परे परवाज़ करता हूँ 

मेरे आग़ाज़ के आगे मेरा अंजाम चलता है


सवालों के जवाबों में कई सदियाँ भटकता हूँ 

मगर हर बार उस ख़ालिक का ही इल्हाम चलता है


कई आवाज़ें उठती हैं तेरे ख़ामोश होठों से

तेरी तहरीर से टूटे दिलों का काम चलता है


‘रज़ा’ हर सूरत-ए-हालात को चुपचाप पढ़ता  हूँ 

मिरी ख़ामोशियों में भी मेरा पैग़ाम चलता है 


 ——-1222/1222/1222/1222


30/06/25

ख़याल-ए-ख़ाम=ग़लत विचार, बुरा विचार, तसव्वुर-ख़्याल, परवाज़-उड़ना, आग़ाज़-शुरुआत, अंजाम-परिणाम, नतीजा, तहरीर-लिखना, इल्हाम= अंदर से उभरने वाला ख़्याल, ईश्वरी प्रेरणा,



120

—————————————-

मौसमों का इशारा है आ जाइए

धड़कनों ने पुकारा है आ जाइए


ऐसा मौक़ा दुबारा मिलेगा नहीं 

ख़ूबसूरत नज़ारा है आ जाइए


जब से रुख़्सत हुए आप इस शहर से

बरकतों का ख़सारा है आ जाइए


आपके ग़म से जीने का फ़न आ गया

हर सितम अब गवारा है आ जाइए


तुमको अपना बनाने की ख़ातिर सनम

दिल अभी तक कुँवारा है, आ जाइए


अब तसव्वुर में भी कोई आता नहीं

दिल मेरा बे-सहारा है, आ जाइए


इश्क़ में इस क़दर हो गया हूँ मगन 

अब तो सब कुछ तुम्हारा है आ जाइए


एक तुम्हारे लिए सब को ठुकरा चुका 

ये ‘रज़ा’ अब तुम्हारा है आ जाइए


——- 212/212/212/212——-

10/07/25

रुख़्सत-रवाना, ख़सारा-नुक़सान, फ़न-कला, गवारा-मंज़ूर, तसव्वुर-कल्पना, 

—————————————-


SALIM RAZA REWA

No comments:

मेरे अपने कर रहे हैं, साथ मेरे छल बहुत salim raza reaa

मेरे  अपने  कर  रहे  हैं  साथ  मेरे  छल  बहुत ये घुटन अब खाए जाती है मुझे हर पल बहुत बज रही है कानों में अब तक तेरी पायल बहुत तेरी  यादें  क...