Tuesday, March 4, 2025

वक़्त ने मुझको कभी - GAZAL BY SALIM RAZA REWA


वक़्त ने मुझको कभी मुर्दा नहीं होने दिया

हाथ फैलाऊँ कभी, ऐसा नहीं होने दिया 


उसके एहसानों का दिल से शुक्रिया है लाखों बार

जिसने इस नाचीज़ को रुसवा नहीं होने दिया


ढल गई अब तो जवानी, जिस्म बूढ़ा हो चला 

पर तुम्हारे प्यार को बूढ़ा नहीं होने दिया


तुमने भी वादा निभाया इस क़दर कि उम्र भर

मुझको पागल कर के फिर अच्छा नहीं होने दिया


तेरी ख़ुशबू ने मो’अत्तर कर दिया है इस क़दर 

मेरी ख़ुशबू ने मुझे, मेरा नहीं होने दिया 

                        

इस बदन को तेरी ख़ुशबू की लगन ऐसी लगी 

इस बदन से फिर कोई रिश्ता नहीं होने दिया


सच को काग़ज़ पर उतारा इस तरह मैंने ‘रज़ा’

सच लिखा और उसको, शर्मिंदा नहीं होने दिया


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पर्वा, परवाह - चिंता। ख़ालिक-सष्टि की रचना करनेवाला ख़ुदा,

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“सलीम रज़ा रीवा” 


Waqt ne mujhko kabhi murda nahin hone diya

Haath phailāūñ kabhi, aisa nahin hone diya


Uske ehsānoñ kā dil se shukriya hai lākhon bār

Jisne is nācheez ko ruswā nahin hone diya


Dhal ga’ī ab to jawānī, jism būṛhā ho chalā

Par tumhāre pyār ko būṛhā nahin hone diya


Tumne bhī wāda nibhāyā is qadar ke umr bhar

Mujhko pāgal kar ke phir achchhā nahin hone diya


Terī khushbū ne mu’attar kar diyā hai is qadar

Merī khushbū ne mujhe, merā nahin hone diyā


Is badan ko terī khushbū kī lagan aisī lagī

Is badan se phir ko’ī rishtā nahīn hone diyā


Sach ko kāgaz par utārā is tarah maine ‘Razā’

Sach likhā aur usko, sharminda nahīn hone diyā


— SALIM RAZA REWA

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وقت نے مجھ کو کبھی مُردہ نہیں ہونے دیا

ہاتھ پھیلاؤں کبھی، ایسا نہیں ہونے دیا


اُس کے احسانوں کا دل سے شُکریہ ہے لاکھوں بار

جس نے اس ناچیز کو رُسوا نہیں ہونے دیا


ڈھل گئی اب تو جوانی، جسم بوڑھا ہو چلا

پر تمہارے پیار کو بوڑھا نہیں ہونے دیا


تم نے بھی وعدہ نبھایا اس قدر کہ عمر بھر

مجھ کو پاگل کر کے پھر اچھا نہیں ہونے دیا


تیری خوشبو نے معطر کر دیا ہے اس قدر

میری خوشبو نے مجھے، میرا نہیں ہونے دیا


اس بدن کو تیری خوشبو کی لگن ایسی لگی

اس بدن سے پھر کوئی رشتہ نہیں ہونے دیا


سچ کو کاغذ پر اُتارا اس طرح میں نے ‘رضا’

سچ لکھا اور اُس کو، شرمندہ نہیں ہونے دیا


— سلیم رضا ریوا

ग़ज़ल की बह्र -रमल मुसम्मन महज़ूफ़

फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाइलुन

2122 2122 2122  212

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Saturday, March 1, 2025

सलीम रज़ा के क़तआ'त - SALIM RAZA REWA


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01

शादाब, जिनकी ख़ुशबू से हर इक गुलाब है

रौशन, चमक से जिनकी “रज़ा” आफ़ताब है

सूरत, वो जिसपे नाज़ है, कुल काएनात को

वो सूरत--रसूल,  ख़ुदा की  किताब है

شاداب جنکی خوشبو سے ہر اک گُلاب ہے 

روشن  چمک سے جنکی  رضاؔ  آفتاب  ہے 

صورت  وہ جسپے  ناز  ہے  کُل کائنات کو 

وو صورتِ   رَسُول ؐ  خدا کی  کِتاب  ہے 


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02

उनके दर पर सलाम कह देना 

मैं हूँ उनका ग़ुलाम कह देना 

उनसे मिलने की दिल में ख़्वाहिश है

मेरा इतना पयाम कह देना 

اُنکے   در   پر  سلام  کہہ  دینا 

میں  ہوں اُنکا   غُلام  کہہ  دینا 

اُنسے مِلنے کی دِل میں خواہش ہے 

میرا   اتنا   پیام   کہہ   دینا 

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03

नबी-ए-पाक, रसूल-ए- ख़ुदा के सदक़े में

हबीब-ए-किब्रिया, ख़ैर-उल-वरा के सदक़े में

दुआएँ उनकी यक़ीनन क़ुबूल होंगी रज़ा

जो माँगते हैं दुआ मुस्तफ़ा के सदक़े में

نبیِ ؐ  پاک  رسوِل خدا کے صدقے  میں 

حبیبِ کِبریا ، خیرولوارا  کے صدقے میں 

دعائیں اُنکی   یقیناً  قُبول  ہونگی  رضا ؔ

جو مانگتے ہیں دُعا مصطفٰی ؑ کے صدقے میں 


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मैं अपने आप से बाहर निकलकर

तेरे साँचे में ढलना चाहता हूँ

तेरे दामन से कुछ ख़ुशियाँ उठाकर 

ग़मों का सर कुचलना चाहता हूँ  

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04

फफ़ोले पड़ चुकी आँखों में, ज़ौक़-ए-दीद बाक़ी है 

बहुत है दूर तू मुझसे, मगर उम्मीद बाक़ी है 

मेरी जाँ लौट के आजा, दिल-ए-बीमार की ख़ातिर

सभी की हो गई है ईद, मेरी ईद बाक़ी है 


فَفولے پڑ چکی آنکھوں میں، ذوقِ دید باقی ہے

بہت ہے دُور تُو مجھ سے، مگر امید باقی ہے

میری جاں لوٹ کے آجا، دلِ بیمار کی خاطر

سبھی کی ہو گئی ہے عید، میری عید باقی ہ

15/04/25

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05

मैंने हर-एक उम्मीद का पुतला जला दिया

दुश्वारियों को पाँव के नीचे दबा दिया

मेरी तमाम उँगलियाँ घायल तो हो गईं

लेकिन तुम्हारी याद का नक़्शा मिटा दिया

مینے  ہر  اک  اُمید  کا  پتلا جلا دیا 

دشواریوں کو پانو کے نیچے  دبا  دِیا  

میری تمام اُنگلیاں گھائل تو ہو گئیں 

لیکِن  تمہاری  یاد  کا  نقشہ مِٹا  دِیا 


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06

ढल गई अब तो जवानी जिस्म बूढ़ा हो गया

पर तुम्हारे प्यार को बूढ़ा नहीं होने दिया

तुमने भी वादा निभाया इस क़दर की उम्र भर

मुझको पागल कर के फिर अच्छा नहीं होने दिया

ڈھل گئی اب تو جوانی جسم بوڑھا ہو گیا 

پر تمہارے پیار کو بوتھا نہیں ہونے دیا 

تمنے بھی وعدہ نبھایا اس قدر کی عمر بھر 

مجھکو پاگل کر کے فِر اچھا نہیں ہونے دیا 

24/03/24 


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07

शर्तों पर ही प्यार करोगे ऐसा क्या 

तुम जीना दुश्वार करोगे ऐसा क्या 

लोगों ने तो ज़ख़्म दिए हैं चुन चुन कर

तुम भी दिल पर वार करोगे ऐसा क्या


شرطوں پر ہی پیار کرو گے ایسا کیا؟

تم جینا دشوار کرو گے ایسا کیا؟

لوگوں نے تو زخم دیے ہیں چن چن کر

تم بھی دل پر وار کرو گے ایسا کیا؟


❣️27/01/24


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08

बन के मेहमान उसकी ग़ुरबत का

लज़्ज़त-ए ग़म को चख के आया हूँ

क़ैद करने को हर अदा उसकी

आँखें चौखट पे रख के आया हूँ 

بن کے مہمان اسکی غربت کا 

لذّتِ غم کو چکھ کے آیا ہوں 

قید کر نے   کو ہر  ادا   اسکی

آنکھیں چوکھٹ پہ رکھ کے آیا ہوں 

❣️16/01/24


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09

इलाज -ए-इश्क़ मुसलसल जो कर गए होते 

दिलों के ज़ख़्म यक़ीनन ही भर गए होते

तुम्हारे इश्क़ ने मुझको बचा लिया वर्ना

ग़म-ए-हयात से अब तक तो मर गए होते

علاج عشق مُسلسل جو کر گئے ہوتے 

دلوں کے زخم یقیناً ہی بھر گئے ہوتے 

تمہارے عشقت نے مجھکو بچت لیا ورنہ 

غم حیات سے اب تک تو مر گئے ہوتے 

01/01/24

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10

हद से गुज़र गई हैं ख़ताएँ, तो क्या करें

ऐसे में उन से दूर ना जाएँ तो क्या करें

उसकी अना ने, सारे त’अल्लुक़ मिटा दिए

उस बे-वफ़ा को भूल न जाएँ तो क्या करें


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11

हाथो में तेरे हमदम जादू नहीं तो क्या है

मिट्टी को तू ने छूकर सोना बना दिया है

उस दिन से जाने कितनी नज़रें लगी हैं मुझ पर

जिस दिन से तूने मुझको अपना बना लिया है


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12

नही कुछ भी छुपाना चाहिए था

अगर ग़म था बताना चाहिए था

मेरी ख़्वाहिश थी बस दो गज़ ज़मीं की

उन्हें सारा ज़माना चाहिए था


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13

समुंदर को कहाँ ख़ुश्की का डर है

वो नदिया हैं जो अक्सर सूखती हैं

अमीर-ए-शहर के ,क़ब्ज़े हैं लेकिन

ग़रीबों की दीवारें टूटती हैं


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14

नूर चेहरे से यूँ छलकता है

जैसे सूरज कोई चमकता है

एक दिन ख़्वाब में वो क्या आया

घर मेरा अब तलक महकता है

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15

चाँद का टुकड़ा है या कोई  परी या हूर है 

उसके चहरे से छलकता हर घड़ी इक नूर है

हुस्न पर तो नाज़ उसको ख़ूब था पहले से ही 

आइने को देख कर वो और भी मग़रूर है


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16

ज़िन्दगी का फैसला हो जाएगा

तू सनम जिस दिन मेरा हो जाएगा

प्यार की, कुछ बूँद ही मिल जाए तो

गुलशन-ए-दिल फिर हरा हो जाएगा


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17

धूप का बिस्तर लगाकर सो गए

छाँव सिरहाने दबाकर सो गए

गुफ़्तगू की दिल मे ख़्वाहिश थी मगर

वो मेरे ख़्वाबों में आकर  सो गए  

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18
उम्र भर मुश्किलें सहता है वो बच्चों के लिए
अपनी  सब ख़्वाहिशे मिट्टी में मिला देता है
हर ख़ुशी छोड़ के परदेश में अपनों के लिए
क़तरा क़तरा वो पसीने का बहा देता है

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19
ज़ख़्म सिलने में कई ज़ख़्म दिए टाँकों ने
कौन से दर्द का इज़हार करूँ मैं पहले
चोट खाया है मेरे जिस्म का हर-इक हिस्सा
कौन से हिस्से को बीमार करूँ मैं पहले
18/01/24

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20
दिल-ओ-दिमाग़ में हर वक़्त चल रहा है वो
मेरे ख़्यालों की हस्ती कुचल रहा है वो
पटक पटक के निचोड़ा जो उसकी यादों को
तो मेरी आँख के रस्ते निकल रहा है वो
15/01/24

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21

फ़रेब-ओ ज़ुल्‍म, गुनाह-ओ- ख़ता से डरते हैं

जिन्हे है ख़ौफ़-ए-ख़ुदा वो ख़ुदा से डरते हैं

किसी ग़रीब की आह-ए-जिगर न लग जाए

इसीलिए तो हर-इक बद्दुआ से डरते हैं

فریب و ظلم، گناہ و خطا سے ڈرتے ہیں

جنہیں ہے خوفِ خدا، وہ خدا سے ڈرتے ہیں

کسی غریب کی آہِ جگر نہ لگ جائے

اسی لیے تو ہر اِک بددُعا سے ڈرتے ہیں

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22

जब वो हँसता है तो, खिल जाते हैं ग़ुंचे दिल के

अपनी बातों से दिल-ओ-जान को महकाता है

दूर हो जाती है दिनभर की थकन पल भर में

जब मेरा लख़्त-ए-जिगर मुझसे लिपट जाता है


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23

कोशिशे बेकार होती जा रही हैं आज कल

मुश्किलें भरमार होती जा रही हैं आज कल

चाहिए इनको हमेशा अब दवाओं की ख़ुराक

ख़्वाहिशें बीमार होती जा रही हैं आज कल


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24
निछावर जिसपे मैंने ज़िंदगी की,
उसे पर्वा नहीं मेरी ख़ुशी की
समझता ही नहीं जो दर्द मेरा,
निगाहों  ने उसी की बंदगी की 
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25
समुंदर को कहाँ ख़ुश्की का डर है
वो नदिया हैं जो अक्सर सूखती हैं
अमीर-ए-शहर का,क़ब्ज़ा है लेकिन
ग़रीबों की दीवारें टूटती हैं

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26
बंदिश ख़्याल रब्त निभाता रहा मगर
इक शेर बा-वक़ार कभी कह नहीं सका
मैंने ज़ुबाँ पे टेप लगाया तो था मगर
कमबख़्त दिल दिमाग़ से चुप रह नहीं सका
15/01/24
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27
वाहिद में जमा और मुज़क्कर में फँस गए
कुछ क़ाफ़िए अरुज़ के ख़ंजर में फँस गए
कुछ में तो रब्त कुछ में मुअन्नस का ऐब था
मेरे हसीन शेर तो  चक्कर में फँस गए
05/01/24
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28
नाज़-ओ-अदा के साथ कभी बे-रुख़ी के साथ
दिल में उतर गया वो बड़ी सादगी के साथ
आएगा मुश्क़िलों में भी जीने का फ़न तुझे
कूछ दिन गुज़ार ले तू मेरी बेबसी के साथ
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29
मौसमों का इशारा है आ जाइए
ख़ूबसूरत नज़ारा है आ जाइए
ऐसा मौक़ा हंसीं फिर मिले न मिले
धड़कनों ने पुकारा है आ जाइए
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30
पहली किरण के साथ नई रौशनी मिले 
गुलशन की तरह महकी हुई ज़िंदगी मिले
ये है दुआ तुम्हारा मुकद्दर रहे बुलंद
तुमको तमाम उम्र ख़ुशी ही ख़ुशी मिले
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31
ये दुनिया ख़ूबसूरत है ज़माना  ख़ूबसूरत है
मुहब्बत की नज़र से देखने की बस जरुरत है
वो  मेरे बिन तड़पते हैं मैं उनके बिन तड़पता हूँ
यही  तो उनकी चाहत है यही मेरी मुहब्बत है
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32
ये और बात है कि वो मिलते नहीं मगर
किसने कहा कि उनसे मेरी दोस्ती नहीं
मैं खुद  गुनाहगार  हूँ अपनी  निगाह  में
उसके वफ़ा ख़ुलूस में कोई कमी नही 
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33
गुज़रना है मुझे उनकी गली से
वज़ू कर लूँ उधर जाने से पहले
तेरे पहलू में ही निकले मेरा दम
यही ख़्वाहिश है मर जाने से पहले
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34
मेरा  मज़हब  यही  सिखाता है
सारी  दुनिया  से  मेरा नाता  है
ज़िन्दगी कम है बाँट  ले खुशियाँ
दिल किसी का तू  क्यूँ  दुखाता है
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35
दूर जितना ही मुझसे जाएँगे 
मुझको उतना क़रीब पाएँगे
कुछ न होगा तो आँखें नम होगीं
दोस्त बिछड़े जो याद आएँगे 
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36
लोग कहते हैं ज़ख़्म गहरा है 
मुद्दतों तक ये भर नहीं सकता
उनकी आदत है यूँ डराने की
मेरी फ़ितरत है डर नहीं सकता 
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37
जिसकी ख़ुश्बू से महक जाए ये दुनिया सारी
फूल गुलशन में कोई ऐसा खिलाना होगा
जिन चराग़ों से ज़माने में उजाला फैले
उन चराग़ों को हवाओ से बचाना होगा

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         कुंडली = दोहा+रोला
सर्दी से घायल हुई थर-थर काँपें धूप
ज़ुल्फ़ सुनहरी खोल कर बदले पल-पल रूप
बदले हर पल रूप, धूप यूँ डरे बेचारा 
सर्दी के डर से है,फिरता मारा- मारा 

मेरे अपने कर रहे हैं, साथ मेरे छल बहुत salim raza reaa

मेरे  अपने  कर  रहे  हैं  साथ  मेरे  छल  बहुत ये घुटन अब खाए जाती है मुझे हर पल बहुत बज रही है कानों में अब तक तेरी पायल बहुत तेरी  यादें  क...